शनिवार, 6 जून 2026

कर्मयोगी के शुरु के दस मिनट

यह जो बंदा है न, दिलीप कुमार को टक्कर देने वाला, इसने मदर इंडिया में भी ऐसा ही किया था। निकल लिया था चुपचाप। झोला उठाया था के नहीं, याद नहीं, पर कंबल (खेस) ज़रूर लपेटा था। 


इस फिल्म (यह जो मैं अभी देख रहा हूँ) में तो बेहद मामूली बात पर निकल गया है घर छोड़कर। और साथ में अपना बेटा भी ले गया है। माँ का जैसे कोई अधिकार ही न हो।

 

उस पर तुर्रा यह, कि यह बंदा उस समय घर छोड़कर निकल रहा है जब यह एक और बच्चे का बाप बनने वाला है (फिल्म की डिमांड के अनुसार, अल्ट्रासाउंड की ज़रूरत के बिना, आप बता सकते हैं कि वह लड़का ही होगा जो बड़ा होकर जीतेंदर बन सकता है अगर मैं आगे भी फिल्म देखने की हिम्मत रखूँ)।

 

यह जो फ़िल्म मैं देख रहा हूँ, इसकी शुरुआत ही बड़ी अजीब सी है। शुरुआत में एक फलवाले के सेब बच्चा ज़बर्दस्ती उठा लेता है। बच्चे का बाप कहता है कि फल उठाएगा ही क्योंकि वह मेरा बेटा है, जमींदार का बेटा। जब जमींदार ऐसा है और फलवाले को पता है कि सेब उठानेवाला जमींदार का बेटा है, तो उसकी हिम्मत हुई ही कैसे उसे मना करने की! ख़ैर... 

 

सेब (कोई एक-दो किलो होंगे) लूटकर ले जाते हुए जमींदार की पीठ पीछे एक पादरी के मुख से  ‘विनाशकाले विपरीत बुद्धि नामक सूक्ति, कहावत या मुहावरा (जो भी कह लें) कहलवाया गया है जो पंचतंत्र या चाणक्यनीति से हम तक पहुँचा है। 

 

गांव में पादरी कहाँ से आ गया? फिल्म 1978 में रिलीज़ हुई। उस समय ईसाई धर्म आज की तरह तो फैला नहीं था। और जिन गावों में पादरी थे भी, सभी धर्मभीरूओं की तरह सत्ता से मिलकर चलते थे। फिल्म का पीरियड क्या है पता नहीं चलता, रेलगाड़ी दिखाई गई है (बोले तो आधुनिक युग है)। फलवाला गांव में फल बेच रहा है, नॉर्मली शहर में बेचा जाता है ठेला लगाकर। पर चलो, मान लेते हैं। जो हो फिल्म आज़ाद भारत के किसी समय की कहानी है।

 

जमींदारी प्रथा ख़त्म कर दी गई थी फिर भी जब फिल्म में गांव का जमींदार हो सकता है तो पादरी भी हो ही सकता है। वैसे भी क़ानूनन ख़त्म कर देने से क्या ही हो जाता है। क़ानून तो दहेज प्रथा और जाति प्रथा के ख़िलाफ़ भी है।   

 

अब जमींदार जी पहुँचते हैं घर, सेब लेकर अपने फ़र्जंद के साथ। उनकी पत्नी माला सिन्हा भगवान को बहुत मानती है और गीता के उपदेश देने से इस फिल्म में अपनी ऐन्ट्री ले चुकी हैं। जमींदार साहब भगवान को मानने की माला सिन्हा की बात को फिज़ूल मानते हैं।  लेकिन फिर भी भगवान (जैसीकिस्न) को फल अर्पित करते हैं।

 

अब अगर वो उस भगवान को मानते नहीं हैं, तो उन्हें फलों का भोग क्यों लगायामाला सिन्हा को ग़लत साबित करने के लिेये वे अपना तर्क तो रखते हैं, पर माला सिन्हा को कुछ बोलने नहीं देते। अभी फिल्म शुरू भी नहीं हुई है कि वे कहते हैं तुम्हारे इस पूजा पाठ का कोई फायदा नहीं और तुम्हारे रास्ते पर चलकर बच्चे भूखे मरेंगे। उपदेश, गीता और संस्कारों का पचड़ा बेचारे जमींदार जी कई वर्षों से झेलते आ रहे हैं।

 

ठीक है, मान लिया तुम्हारा पूजा पाठ में विश्वास नहीं है। पर तुम्हारी बीवी को तो है। उसे करने दो  पूजा। तुम अपने कमरे में जाकर पड़े रहो, इत्ती बड़ी हवेली है जिसका पूजा का कमरा ही मेरे घर के बराबर है।

 

बताओ, इत्ती सी बात पर अपनी बीवी को छोड़कर अगला निकल्लिया ऐ और कह रहा है आज से शंकर दुर्गा के लिये मर गया। अबे तू कुछ शर्म कर, गांव का जमींदार है तू, और घर का स्वामी है। भला कोई माला सिन्हा जैसी ख़ूबसूरत पत्नी को छोड़कर कैसे जा सकता है। जब शंकर दुर्गा के लिये मर गया वाला डायलाग आता है तो माला सिन्हा दुख में आह टाइप भरते हुए आँख बंद करती है, तो आखों की पलकों पर जो काला या हरा-सा लगाया जाता है, वह तक दिख जाता है। होठों पर भी चमकीली वाली लिपिस्टिक लगा रखी है। अगली ने पूजापाठ के साथ-साथ मैं कैसी दिखती हूँ का ध्यान भी रखा है।  

 

तू मत मान भगवान को। वह मानती है तो उसे करने दे पूजा पाठ। और फिर दो अलग-अलग विश्वासों के लोग क्या एकसाथ रह नहीं सकते


हम नहीं रहते क्या? हमारे घरों में बच्चे आपस में, अपने माँ-बाप से और माँबाप अपने माँबाप से लड़ते झगड़ते रहते हैं। हमारे यहाँ तो यह भी स्कोप नहीं कि गुस्सा आने पर अपने कमरे में जाकर सो जाएँ, क्योंकि अपना कमरा कोई है ही नहीं। चाहे प्यार हो या लड़ाई हो, सबको एकदूजे का थोबड़ा देखते हुए ही रहना-खाना-सोना-रोना-धोना है।


अभी दस मिनट की फिल्म में एक अच्छी बात यह हुई है कि फल वाले को उसके सेब वापस मिल जाएंगे।

 

हालाकि फिल्म का डारेक्टर राम माहेश्वरी मेरे ही गांव का है, पर मेरा तो मूड ऑफ-सा हो रा। अब आग्गे देखने का दिल-सा ना कर्रा कर्मयोगी देखने का।  

 

कोई दूसरी फिलिम लगाऊँ।

 

 


 तुम तक पहुँचने का सफ़र

बहुत कठिन था

शाहराह को छोड़कर

एक पगडंडी पकड़नी थी

और ख़ुद से बाहर निकलकर 

तुम तक जाना था। 

कोई पुकार थी जिसे

अनसुना करने की कोशिश में

मैं खड़ा रहा बहुत दिनों तक

अपना रास्ता रोके

और जब चला ख़ुद को मारकर

तो अपनी लाश को ढोना पड़ा


लो आख़िर मैं तुम तक आ गया

सिर्फ़ यही देखने के लिये 

कि तुम हो ही नहीं


तो फिर जिसे मैंने देखा

वह क्या था

अनगिनत खपरैलें थीं

जो सीधी नज़र से देखने पर

चेहरा बनाती थीं तुम्हारा

देखने का कोई और कोण

था ही नहीं मेरे पास


देख रहा हूँ

वापसी का सफ़र और भी कठिन है

क्योंकि

इस बार तो मैं जानता हूँ

कि

वहाँ पहुँचने पर

मैं नहीं मिलूँगा।