25 February 2026
अंदर ही जब खड़का करै था,
डोला करै था बार के पास
हार्ट फेल अब काय कू होगा,
रखवाय दियौ जब यार कै पास
जो मुझ पर ज़ाहिर हुआ है या जिसका मुझसे कुछ भी वास्ता है
चाहे कहीं के भी राजा का रोल करें लेकिन डायलाग बोलेंगे
पंजाबी वाली हिंदी में ही, जिसे बोलते-बोलते दारा सिंह अपने नवजात शिशु (जो आगे चलकर मीताब-अच्चन बनेगा) की छाती
पर उसका नाम लिखते हैं – मर्द। यह सीन देखकर ऐसी सिहरन-सी मन में दौड़ गई कि सर्दी
की ठिठुरन ग़ायब हो गई अपने-आप।
जब-कहो-तब-रो-पड़ने-को-तैयार
चेहरा लिये जब निरूपा रोये अपने बच्चे को ना पाकर रोती है और उसकी आवाज़ भी चली
जाती है, तब इस सीन को देखकर रोकते-न-रोकते मेरे एक बाल्टी गरम-गरम आंसू भी निकल पड़े। निरूपा रोये का रोना और मनमोहन देसाई का फ्लिम
बनाना आज भी सफल रहा।
उसके बाद
जो घोड़े ने कमाल दिखाया बच्चे को अनाथ आश्रम जा पहुँचाया, उसे देखकर तो शरीर में 200 वोल्ट का
करंट ही दौड़ गया (इसी घोड़े पर दारा सिंह जैसे उछलकर बैठता है, देखना बड़ा होकर
मीताब-अच्चन भी वैसे सवार होगा। मुझे पता है क्योंकि ये फ्लिम मैंने, पिछले नौ दिन
में तीन बार देखी है)।
येई मीताब-अच्चन
जब अपने पापा वाला ही डायलाग बोलता है – ‘पीठ पर
वार करोगे तो सीने पर खाओगे’, तो
सुनकर मेरी रगों में ख़ून का दौरा और तेज़ हो गया, गर्मी बढ़ गई।
फिर जब कमीनेपन की चिकनाई से चमकता
चेहरा लिये प्रेम चोपड़ा डैलाग बोलता है कि – हमारा आधा ख़ून पानी है और आधा
इंग्लिस्तानी है – तो इस डैलाग को सुनकर गुस्से के मारे मेरे शरीर में गर्मी का दौरा चढ़ गया और जी चाहा कि गला
ही घोंट ना दूँ इसका!!!
फ्लिम चल रई थी और मेरा नहाना भी। तभी
अचानक ठंडा पानी ठंडा लगने लगा, इतना कि सूईयों की तरह चुभने लगा। देखा कि मूए
यूट्यूब ने फ्लिम रोककर ऐड चला दी है।
साबुन लगे हाथों से मोबाइल में स्किप
का बटन बड़ी मुश्किल से दबा और मैं फिसलते-फिसलते भी बचा।
जब अमृता सिंह की एन्ट्री हुई तो रोमांटिक
गर्मी से बाकी बचा स्नान सम्पूरन किया।
लगता है यूट्यूब प्रीमियम लेना ही
पड़ेगा। गीज़र से तो सस्ता ही पड़ेगा।
क्या कहते हैं आप?
असग़र वजाहत लिखित मशहूर नाटक ‘जिस ल्हौर नई वेख्या ओ जम्मेआ ई नई’ का मंचन रवि तनेजा के निर्देशन में 14 अगस्त 2025 को दिल्ली के मंडी हाउस स्थित श्री राम सेंटर में हुआ। विभाजन की त्रासदी पर आधारित इस नाटक को देश की कई मंडलियाँ प्रस्तुत करती रहती हैं।
नाटक एक बुज़ुर्ग हिंदू महिला के चारों ओर घूमता है जो लाहौर की अपनी हवेली में अकेली रह गई है। लखनऊ से आया एक मुस्लिम परिवार जब उस हवेली में रहने आता है तो उसे पता चलता है कि उस हवेली में एक बुजुर्ग हिंदू औरत अभी भी मौजूद है। वह अपने घर को छोड़ने को तैयार नहीं, लेकिन आए हुए मुस्लिम परिवार को रहने की इजाज़त भी दे देती है। उस बुज़ुर्ग महिला से इस मुस्लिम परिवार का और मोहल्ले के सभी लोगों का एक भावनात्मक जुड़ाव पैदा हो जाता है। लेकिन कुछ पड़ोसी और इलाके के कट्टरपंथी लोग इस बात का विरोध करते हैं कि एक हिंदू महिला को पाकिस्तान में रहने दिया जाए।
यह नाटक विभाजन की त्रासदी को एक बहुत ही मानवीय दृष्टिकोण से दिखाता है। यह बताता है कि भले ही राजनीतिक और धार्मिक कारणों से ज़मीन का बँटवारा हो गया हो, लेकिन लोगों के दिलों से इंसानियत को मिटाना असंभव है।
रवि तनेजा ने बूढ़ी महिला का क़िरदार बख़ूबी अदा किया। सभी अभिनेताओं ने अपने-अपने पात्रों के साथ न्याय किया। सेट पर और काम किया जा सकता था, लेकिन सेट की यह कमी अखरी नहीं। रविंदर मिश्रा की प्रकाश व्यवस्था और डालचंद की वस्त्र सज्जा ने नाटक के प्रभाव को सशक्त बनाया। दृश्य परिवर्तन के दौरान सजीव संगीत ने तारतम्यता बनाये रखने में अहम भूमिका अदा की। सूफ़ी कवियों और कबीर की वाणी को मुख्य रूप से इस दौरान गाया गया। कुछ पंक्तियाँ गुरु ग्रंथ साहब से भी ली गईं। नाटक के अंतिम हिस्से में बहुत देर तक कालिमा का रहना अखरता है। दृश्य खुलने में देर होती है।
इसे शायद संयोग ही कहा जाएगा कि पिछले कुछ वर्षों से 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका दिवस मनाया जाता है उसी दिन यह नाटक किसी सरकारी आयोजन का हिस्सा बने बिना प्रस्तुत हुआ। पिछले लगभग 25-30 वर्षों से खेले जा रहे इस नाटक की प्रासंगिकता सार्वभौमिक और सर्वकालिक है।
इस नाटक के बहाने शहर-ए-लाहौर प्रेम और बंधुत्व का प्रतीक बन जाता है। जिसने प्रेम और बंधुत्व न जाना, उसका पैदा होना बेकार है।
https://youtu.be/T_o_Rcys3-8
बहुत दिन बीते भाई तुमसे बात न कुछ हो पाई। जाने क्या है तुम्हारा हाल अनिश्चित बीता यह सारा साल। हों ख़त्म सभी मलाल कहीं तो कुछ ठहराव आए।
दिल्ली देश की राजधानी होने के साथ साथ
सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र भी है। देखा जाए तो किसी भी एक वर्ष में दिल्ली
में जितने विविध कार्यक्रम होते हैं शायद ही विश्व के किसी और शहर में होते हों।
अगर मान भी लिया जाए कि कहीं और भी इतने कार्यक्रम होते होंगे तो भी एक बात तो
निश्चित तौर पर कही जा सकती है कि तमाम सांस्कृतिक कार्यक्रम और शहरों के दर्शकों
को इतने सुलभ नहीं होते होंगे जितने दिल्ली के दर्शकों को। वर्ष 2013 के दौरान दिल्ली में रंगमंच की कई गतिविधियां रहीं।
दिल्ली में हर वर्ष जनवरी में भारत रंग महोत्सव
का आयोजन होता है। इस वर्ष भी देश विदेश के कई नाटक प्रस्तुत किए गए थे। साल 2014
की 4 जनवरी को इसका आग़ाज़ होने जा रहा है। जनवरी 2014 में देश विदेश के लगभग 70
नाटक इस महोत्सव में प्रस्तुत किए जाएंगे।
फरवरी माह में नेशनल बुक ट्रस्ट और संगीत नाटक
अकादेमी ने मिल कर लोक एवं जनजातीय कलाओं का उत्सव देशज प्रस्तुत किया। दिल्ली
के प्रगति मैदान में विश्व पुस्तक मेले के समय आयोजित इस उत्सव में देश भर से 29
लोक मंचीय कलाओं को प्रस्तुत किया गया। उत्सव का शुभारंभ तीजन बाई की पंडवानी गायन
प्रस्तुति से किया गया। देशज में कई ऐसी प्रस्तुतियाँ थीं जो दिल्ली वालों ने
पिछली बार कब देखी हों शायद उन्हें याद भी नहीं होगा जैसे छत्तीसगढ़ का बस्तर बैंड, मणिपुर का कबूई नागा नृत्य, केरल की बाम्बू सिंफनी, नागालैंड के अओ कबीले का
लोक नृत्य व संगीत, असम का बगरुमबा और बोडो नृत्य, लक्षद्वीप का कोलकली, बिहार का बहुरा गोढ़नी, ओड़ीशा का घूमरा और त्रिपुरा का होजगिरी। उत्सव की अंतिम प्रस्तुति में
गुजरात भारत में रहने वाले अफ्रीकी मूल की जनजाति द्वारा प्रस्तुत सिद्धि धमाल ने लोगों
को झूमने के लिए मजबूर कर दिया था।
संगीत नाटक अकादेमी प्रदर्शनकारी कलाओं के
क्षेत्र में देश के सर्वोच्च सम्मान प्रदान करती है। इस वर्ष 2012 के लिए रतन थियम फ़ेलो चुने गए और दिल्ली की निर्देशिका
त्रिपुरारी शर्मा को निर्देशन के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए अकादेमी पुरस्कार
प्रदान किया गया। वर्ष 2013 के लिए भी पुरस्कारों की घोषणा हो चुकी है जिसमें
दिल्ली में रहने वाले नाटककर रामेश्वर प्रेम को संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार के
लिए चुना गया है।
दिल्ली सरकार की
प्रमुख संस्था साहित्य कला परिषद 1974-75 से काम कर रही है। यह न सिर्फ मंच कलाओं
बल्कि साहित्य व ललित कलाओं के संवर्धन के लिए भी प्रयासरत रहती है। इस बीच लोक
कलाओं को भी इसमें सम्मिलित किया गया है। साहित्य कला परिषद की खासियत यह रही कि
इसने रंगमंच को मंडी हाउस से निकालकर दिल्ली के विभिन्न कोनों तक पहुँचाने की
कोशिशें की हैं। साहित्य कला परिषद का एक जनकपुरी केंद्र भी है।
गत वर्ष की
उत्कृष्ट प्रस्तुतियों का समारोह भारतेन्दु नाट्य उत्सव इस साल मार्च में किया गया
था। इसमें
नथाराम गौड़ की
नौटंकी लैला मजनूँ अनिल चौधरी के निर्देशन में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय
रंगमंडल द्वारा प्रस्तुत की गई।
भगवती चरण वर्मा
के उपन्यास चित्रलेखा का नाट्य रूपान्तरण सुरेन्द्र वर्मा के निर्देशन में
रंगसप्तक ने प्रस्तुत किया।
रमेश मेहता के
नाटक उलझन को सोहेला कपूर के निर्देशन में थ्री आर्ट्स क्लब ने प्रस्तुत
किया।
मेरी जिम्मरमैन का
लिखा नाटक मेटामारफोसिस कुसुम हैदर के निर्देशन में यात्रिक ने प्रस्तुत
किया।
मंटो की कृतियों
को केंद्र में रखकर दानिश इकबाल द्वारा लिखित नाटक एक कुत्ते की कहानी सलीमा
रज़ा के निर्देशन में विंग्स कल्चरल सोसाइटी द्वारा प्रस्तुत किया गया।
तड़ित मिश्रा
द्वारा लिखित और निर्देशित नाटक अनावृत संसप्तक ने प्रस्तुत किया।
जयवर्धन द्वारा
लिखित नाटक किस्सा मौजपुर का की प्रस्तुति चित्रा सिंह के निर्देशन में
रंगभूमि ने की। और
ब्रात्य बसु
द्वारा लिखित नाटक सेवेंटींथ जुलाई बापी बोस के निर्देशन में सर्किल थियेटर
प्रस्तुत किया गया।
थियेटर में बच्चों
के लिए कार्यशाला और नाट्योत्सव का आयोजन जिसे नटखट उत्सव कहा गया है।
इसके अलावा
उत्कृष्ट मौलिक नाटकों का मंचन सितंबर महीने में मोहन राकेश सम्मान एवं नाट्य
समारोह में किया गया। इसमें
मोहन राकेश का
नाटक आधे अधूरे क्षितिज संस्था द्वारा भारती शर्मा के निर्देशन में
प्रस्तुत किया गया। इस साल जिन नए नाटककारों और नाटकों को प्रस्तुत किया गया उनके
नाम हैं:
संदीप लेले का मारे
गए गुलफाम जिसका निर्देशन नटसम्राट के लिए श्याम कुमार ने किया
अदिति जैन का सपनों
की देहरी के उस पार श्रीराम सेंटर रंगमंडल ने प्रस्तुत किया जिसके निर्देशक थे
कृष्णकांत,
संतोष कुमार
निर्मल का राम कभी मरता नहीं लोकेन्द्र त्रिवेदी के निर्देशन में अभिज्ञान
नाट्य एसोसिएशन ने प्रस्तुत किया और
ज्ञान सिंह मान का
काठ के घोड़े सोहेला कपूर के निर्देशन में कात्यायनी संस्था ने प्रस्तुत
किया।
साहित्य अकादेमी
दिल्ली ने भी नाट्य पाठ के कार्यक्रम शुरू किए। इनमें प्रभाकर श्रोतिय का नाटक इला, डी पी सिन्हा का नाटक सम्राट
अशोक और सुरेन्द्र वर्मा का नाटक मुग़ल महाभारत शामिल हैं। सुरेन्द्र वर्मा
का मुग़ल महाभारत चार नाटकों की कड़ी है। इस चतुष्टय को हिन्दी रंगमंच के
इतिहास में एक अहम घटना के तौर पर देखा जाना चाहिए। इसमें मुग़ल काल के समय, कूटनीति और दुश्चक्रों का बेहद सजीव चित्रण सुरेन्द्र वर्मा ने किया है।
साल के आखिर में
श्रीराम सेंटर ने अपने फेस्टिवल को पुनर्ज्जीवित किया है। इस बार उन्होंने टाइम्स
ऑफ इंडिया के साथ आयोजित किया। इसमें रंजीत कपूर की प्रस्तुतियाँ द जनपथ किस
और चेखव की कहानियाँ देखने को मिलीं।
राष्ट्रीय नाट्य
विद्यालय को इस वर्ष एक नए अध्यक्ष के रूप में रतन थियम मिले और एक नए निर्देशक के
रूप में वामन केंद्रे। इसी वर्ष राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में कुछ ऐसी
प्रस्तुतियां की गईं जिन्हें उनके मिजाज और तेवर के लिए याद रखा जाएगा जैसे
रोयस्टेन एबल द्वारा निर्देशित ओल्ड टाउन, अनुराधा कपूर द्वारा निर्देशित विरासत
नाट्य त्रयी, और दिनेश खन्ना द्वारा निर्देशित जिम मॉरिसन।
दिल्ली में लंबे
समय तक रहने वाले मराठी नाटककर गोविंद पुरुषोत्तम देशपांडे का इस वर्ष 16 अक्तूबर
को निधन हो गया। सत्यशोधक, उद्ध्वस्त धर्मशाला, रास्ते और आंधार
यात्रा जैसे महत्वपूर्ण नाटक लिखने वाले गो पु देशपांडे को दिल्ली और देश की
समस्त नाटक बिरादरी का प्यार और श्रद्धा हमेशा मिलती रहेगी।
इसके अलावा
महेंद्र एक्सीलेंस इन थिएटर अवार्ड्स का फेस्टिवल देश भर की नाट्य गतिविधियों में
श्रेष्ठतम को सामने लाने का प्रयास करता है। और पिछले तीन-चार वर्षों से दिल्ली
में एक नया रूझान शुरू हुआ है 10 मिनट के नाटकों का। इस बार भी शॉर्ट एंड स्वीट
फेस्टिवल में यह प्रस्तुतियाँ की गईं।
30 दिसंबर 2013
साहित्य कला परिषद् दिल्ली द्वारा 18 से 25 मार्च 2013 के दौरान श्री राम सेंटर में आयोजित भारतेंदु नाट्य उत्सव का समापन सर्किल थियेटर की प्रस्तुति 'सेवेंटींथ जुलाई' के मंचन से हुआ। इस नाटक का निर्देशन बापी बोस ने किया है।
मन में बेहद जिज्ञासा थी इस नाटक को देखने की। इसका आरंभिक प्रदर्शन दिसंबर में हो चुका था, पर तब उसे मैं देख नहीं पाया था। चूंकि इस शीर्षक के किसी नाटक से मैं पहले वाकिफ नहीं था इसलिए मैं बस यह कयास लगा रहा था कि यह किसी सत्रह जुलाई को घटी किसी घटना से सम्बंधित होगा। फिर एक दिन बहावलपुर हाउस, भगवानदास रोड के मुख्य द्वार के पास बाहरी दीवार पर नाटक का होर्डिंग देखा। पीटर पॉल रूबेन की पेंटिंग ‘द रेप ऑफ डाटर ऑफ लूसीप्पस’ के बैकड्रॉप वाले इस होर्डिंग को पढ़कर पता चला कि 'सेवेंटींथ जुलाई' भारत में एक दशक पूर्व वहशियाना ढंग से अंजाम दिये गए नरसंहार में मारे गए बेकसूर लोगों को समर्पित था।
मन में यह शंका उत्पन्न हुई कि कहीं यह नाटक एक नारेबाजी तो नहीं बन जाएगा। लेकिन बापी-दा द्वारा निर्देशित एक अन्य नाटक 'परमपुरुष' दो वर्ष पूर्व (अप्रैल 2011 में) अहमदाबाद में देखा था जिसका सात्विक प्रभाव अभी तक मन में बना हुआ था, और बापी-दा के काम करने की धुन को देखते हुए यह तय था कि प्रस्तुति कुछ विशेष होगी - और वही हुआ भी।
इस नाटक के लेखक ब्रात्य बसु ने यह नाटक उत्पल दत्त के एक नाटक मानुषेर अधिकारे से प्रेरित होकर लिखा है जो स्वयं जॉन वेक्सले के एक नाटक 'दे शैल नॉट डाई’ से अनूदित था। लेकिन ‘सेवेंटींथ जुलाई’ आज का नाटक है, हमारे समय का - हमारे आसपास और कई बार हममें घटता हुआ।
नाटक अपनी शुरुआत से ही सभागार में मौजूद दर्शकों को अपनी गिरफ्त में ले लेता है। घुप्प अंधेरे में भागती दो लड़कियों की चीख और उनके पीछे पड़े कुछ गुंडों की आवाज़ें। अंधेरे में लड़कियां दर्शकों के बीच से भागती हैं और मंच पर जाकर गुम हो जाती हैं। फिर हाल में अल्ट्रावैलेट रौशनी की जाती है। इस रौशनी में मंच पर प्रकट होता है एक विशालकाय अजगर जो हाल में बैठे दर्शकों की ओर आता है और समूचे हाल में मानों अपनी ज़हरीली साँसें छोडता हुआ, जीभ लपलपाता हुआ इर्द-गिर्द घूमता है। जितनी मेहनत से इसे बनाया गया था उतनी ही मेहनत से इसे आकाश खत्री, अमित कुमार, जीतू नागर, मधुमिता बारिक, अमर शाह और राहुल गाबा ने काले कपड़े पहनकर इसका संचालन भी किया था ताकि अल्ट्रावैलेट रोशनी में केवल अजगर दिखे। दर्शक सांस रोके बैठे हैं। सुरोजित डे द्वारा बनाए गए इस लंबे अजगर के पुतुल को वे मन ही मन सराह भी रहे हैं और अवचेतन में उसका संदेश भी ग्रहण कर रहे हैं। साइक्लोरामा पर एक वीडियो दिखाया जाता है जिसमें एक 3-4 साल का बच्चा बता रहा है के उसके परिवार वालों को कैसे मारा गया। आगे चलकर यह बच्चा कहता है कि बड़ा होकर वह हिंदुओं को मारेगा। प्रश्न पूछने वाले के यह पूछने पर कि ‘मैं भी तो हिन्दू हूँ क्या मुझे भी मार दोगे’ उस बच्चे का सादगी और भोलेपन से कहना कि ‘आप तो मुसलमान हो’ हमारे तथाकथित समावेशी समाज की असलियत उघेड़कर रख देता है।
बलात्कार के एक झूठे केस में फंसे आसिफ मिर्ज़ा और उसके कुछ मुस्लिम साथियों पर मुकद्दमें की सुनवाई को दिखाता यह नाटक आज के भारत की राजनैतिक तस्वीर प्रस्तुत करता है। घटनाएँ और परिस्थितियाँ गुजरात के पंचमहल जिले की एरोल तहसील में घटित होती हैं। इन सबको को आधार बनाकर लिखा गया यह नाटक सांप्रदायिक कट्टरता और आस्था के राजनीतिकरण को नकारता है।
लेकिन यहाँ एक बात मन में उठती है। मान लीजिये कि आपको भारत की राजनैतिक तस्वीर से कुछ लेना-देना नहीं। न ही आपको हिन्दू-मुस्लिम झगड़े से कोई मतलब है। आप तो बस एक अच्छा नाटक देखने आते हैं। ज़ाहिर है आपको पता है कि नाटक है तो कुछ धीर-गंभीर संदेश भी होगा। सो उससे आपको गुरेज नहीं। उसे आप ग्रहण भी करेंगे और सराहेंगे भी। लेकिन साथ ही एक अच्छा नाटक भी तो होना ही चाहिए। इस मानदंड पर अपने आदि-मध्य-अंत के साथ यह नाटक खरा उतरता है। मंच पर होती घटनाओं से आप जुडते जाते हैं और उत्सुकता बरकरार रहती है। दर्शक इसी मुद्दे पर दम साधे बैठे रहते हैं कि आसिफ और उसके दोस्तो को न्याय मिल पाएगा या नहीं। हम सभी आसिफ के प्रति सहानुभूति रखते हैं क्योंकि मुक़द्दमे का क्रूर मज़ाक हमारी आँखों के सामने हो रहा है, विधि-सम्मत प्रक्रिया की धज्जियां हमारे सामने उड़ रही हैं।
मुकद्दमे की सुनवाई के दौरान भारतीय राजनीति का असल चेहरा सामने आता है जो ऊपर से देखने में हमारे धर्मनिरपेक्ष संविधान के सिद्धांतों के स्वर्णिम फ्रेम में जड़ी नज़र आती है परन्तु सांप्रदायिकता का अजगर जिसे अपने पाश में बुरी तरह जकड़े बैठा है। दुःख की बात यह है कि सभी 'स्टेकहोल्डर्स' अपने-अपने तर्कों से अपनी साम्प्रदायिकता को जायज़ ठहराते हुए दुसरे गिरोह की साम्प्रदायिकता का हवाला देते हैं।
सियासी फायदा लेने के लिए सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काकर लोगों को कैसे गोलबंद किया जाता है इसे बिना लाग लपेट के बिल्कुल बेबाक दिखाया गया है। दो वकीलों पंकज पारिख और राकेश चटर्जी की आपसी बहस के माध्यम से वैचारिक टकराव को भी दर्शाया गया है। लेकिन साथ ही विवेकपूर्ण, न्यायसंगत सचेतन आवाजें कभी शांत नहीं होंगी यह भी सन्देश इस नाटक के द्वारा दिया गया है।
मंच पर एक पुलिस स्टेशन, अदालत और एक ड्राइंग रूम के दृश्य हैं जिनके सेट लगभग हर समय मंच पर मौजूद रहते हैं। ऐसा लगता है मंच छोटा पड़ गया है पर धीरे-धीरे अदालत ही मुख्य हो जाती है। प्रकाश अभिकल्पन के लिए तो बापी-दा जाने ही जाते हैं। एक मल्टी मीडिया प्रस्तुति होते हुए भी कोई गिमिक्स नहीं बल्कि विशुद्ध नाटक ही उभरकर सामने आता है जिसके केंद्र में अभिनेता है, न कि डिज़ाइन।
तीन घंटे के नाटक को अभिनेताओं ने अपनी पूरी प्रतिभा और ऊर्जा से इस कामयाबी के साथ अंजाम दिया कि रात 8 बजे घड़ी देखने लगती और घर के लिए खिसकने की आदत वाली दिल्ली की आडियन्स पूरे नाटक के दौरान बैठी रही – मध्यांतर के बाद भी हाल सहृदय दर्शकों से भरा रहा। आसिफ मिर्ज़ा के किरदार में प्रकाश चंदर, नाथीबेन और चिंताबेन के किरदारों में क्रमशः गौरी देवल और मधुमिता बारीक, पंकज पारिख के किरदार में स्वप्न विश्वास और राकेश चटर्जी के रोल में दिगंबर प्रसाद या फिर भीम भाई रावी के चरित्र में मदन डोगरा और आर एस एस के काडर गोविंद मोदी (जो एक होटल का वेटर भी है) के चरित्र में आकाश खत्री – सभी ने जानदार अभिनय किया। बंगला लहजे वाले अभिनेताओं ने गुजरात की सेटिंग में भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। दरअसल नाटक की विषयवस्तु पूरे देश को छूती है इसलिए यह अखरता नहीं। अब जबकि ज़्यादातर सोलो या फिर कम पात्रों वाले नाटक ढूँढे और खेले जा रहे हैं, बापी-दा ने अपने सीमित संसाधनों में एक समय में लगभग 25-30 लोगों की टीम के साथ काम किया है और बड़े सेट और सामग्रियों वाले इन नाटकों को प्रस्तुत किया है।
इस नाटक में घटनाओं का इतना बेबाक निर्भीक चित्रण पूरे रंगमंचीय कौशल और दक्षता के साथ निभाना बापी-दा के ही बूते की बात थी। हिन्दू-मुसलमान की बहस जो हमारे घरों में घुसी हुई है उसे जस-का-तस पेश करना और राजनीतिक नेताओं के नाम खुलेआम लेना एक बेहद जोखिम भरी कोशिश थी। नाटक मानों तलवार की धार पर चलता है।
‘सेवेंटींथ जुलाई’ मानवता के दृष्टिकोण के साथ कुछ ऐसे सवाल पूछता है जिन्हें किसी मंच से पूछने से बहुसंख्यक लोग बचते आए हैं, जैसे – क्या इस देश की हर समस्या के लिए मुसलमान जिम्मेदार हैं? क्या भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र नहीं है? हिन्दुत्व विचारधारा वाले वकील द्वारा बार-बार मुसलमानों के लिए पाकिस्तानी शब्द का सम्बोधन और अदालत में मौजूद दर्शकों द्वारा ऐसे संबोधनों पर तालियाँ पीटना एक तथाकथित पॉपुलर सोच को प्रगट करता है और इस सोच के लिए हम कहीं-न-कहीं शर्मिंदा भी होते है। ज़ाहिर है कि धर्म अलग होने से हमारी समस्याएँ अलग नहीं हो गई हैं और असल जड़ कहीं और है। पर इतनी सीधी-सी बात किसी को समझ क्यों नहीं आती?
श्री राम सेंटर में इमारत के मुख्य फोयर में इस नाटक से संबन्धित एक इंस्टलेशन भी लगाई थी जिसे दुर्भाग्यवश मैं देख नहीं पाया और वहाँ कुछ रिकॉर्ड किए गए इंटरव्यू भी सुने जा सकते थे जो गुजरात दंगों के पीड़ित मुस्लिम भाईचारे के सदस्यों के थे।
‘सेवेंटींथ जुलाई’ कुल मिलाकर यही कहता है कि जितनी जल्दी हो सके और जितनी दृढ़ इच्छाशक्ति से हो सके फिरकापरस्ती के अजगर से छुटकारा पाया जाना चाहिए। हमें मिलकर ऐसे विकास की ओर देखना होगा जो सबके लिए हो जिसमें सबके लिए जगह हो। बेशर्म राजनैतिक हितों के खेल के इस दौर में किसी कृति से और क्या आशा की जा सकती है?
20 April 2013