मंगलवार, 19 मई 2026

बेबस

देखा उसने
छुआ उसने
ठुकराया उसने
पाया उसने
दुलारा उसने
लताड़ा उसने
संभाला उसने
खंगाला उसने
दरवाज़े खोले उसने
और बंद भी किये
कभी बाहर से कभी अंदर से

मैंने ख़ुद को उसे दिया
उसने लिया, न लिया
जब चाहा जो चाहा उसने किया

कि बस मैं 
तड़फड़ाता उसके वश में
रह गया

कि बस मैं 
बह गया

उससे छीनता रह गया
ख़ुद को
टुकड़े ही बीनता रह गया
हीनता रह गया
कि बस मैं
उसके किये को ही जिया

उससे भाग रहा हूँ 
सिलवटों में उलझकर गिरा हुआ मैं
ख़ुद को भरसक आवाज़ लगाकर रुक जाने को कह रहा हूँ
ख़ुद को ख़ुद का नाकाम वास्ता देकर
 
कि बस मैं उससे नहीं ख़ुद से ही भाग रहा हूँ

मैं उससे भागता हुआ
उसी की ओर भाग रहा हूँ
कि बस मै...

सोमवार, 13 अप्रैल 2026

प्रभावित

हमें किसी से प्रभावित होने की ज़रूरत नहीं क्योंकि हम जो हैं सो हैं। यही बात दूसरे पर भी लागू होती है। वह जो है सो है। किसी से प्रभावित होते ही उसकी कमियों को नज़रअंदाज़ कर देना पड़ता है। ऐसा लगता है उसने जो कह दिया ठीक ही है। जो किया कुछ सोचकर ही किया होगा। फिर हम भी वैसे ही होते जाते हैं और अपने होने को छोड़ देते हैं। प्रभावित होइये तो ख़ुद ही से होइये और अपने जीवन से जुड़े हर फैसले की एजेंसी ख़ुद लीजिए। 


किसी से प्रभावित न होने की वजह से और अपने से जुड़े सब निर्णयों को स्वयं ही लेने, उसके अच्छे-बुरे प्रभावों को स्वयं सहन वहन करने की प्रैक्टिस के कारण कहीं आप कुंदन ना बन जाएँ और लोग आपकी चमक से प्रभावित होकर आपसे प्रभावित होना शुरु न कर दें बस यही डर है। 


क्योंकि जब किसी से प्रभावित नहीं होना है, तो किसी को प्रभावित करना भी नहीं  है। 


क्या कहा? 

आप मेरी इस बात से बहुत प्रभावित हैं!!

बस मुझसे आकर मिलिये, और मुझे किसी अच्छे-से रेस्तराँ पर कॉफी पिलाने ले जाइए। 


प्रभावितों की प्रतीक्षा में रत

मैं


13 अप्रैल 2026

मंगलवार, 31 मार्च 2026

गोविंदा से गाँधी, बावर्ची तक

हीरो नंबर वन में जिस प्रकार नौकर बना गोविंदा नमस्कार को नमष्कार (या नमश्कार, जो भी कह लें, की फरक पैंदा) बोलता है न, उससे सच्ची में, मैं पुटऑफ हो गया। 


सोचा कि नौकर बीवी का देख डालूँ, पर वह तो महाबकवास फिल्म है। ऐसी ख़राब एडिटिंग है कि कहानी का सिर पैर ही पता नहीं चलता। 


उसे छोड़ा वापस हीरो नंबर वन पर आया कि एक ग़ुंडे से फिल्म में कहलवाया गया कि गांधी ने कहा है, कोई तुम्हारे एक गाल पर थप्पड़ मारे दूसरा गाल आगे कर दो।


मैंने देखा है कि आम जनता तो इई है, बहुत से आलिम फ़ाज़िल गांधी के नाम पर यह वाक्य चस्पा करते हैं।  


भाई, अगर आप भी यही मानते हैं तो मुझे बताने का कष्ट करें कि मोहनदास करमचंद गांधी नाम के शख़्स ने यह कब और कहाँ और किस संदर्भ में कहा था। 


ख़ैर जी, अब सोच रहा हूँ चाची 420 या राजेश खन्ना वाली बावर्ची देख डालूँ।


तुस्सी की कैहंदे ओ?


19 मार्च 2026

बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

 25 February 2026

अंदर ही जब खड़का करै था,

डोला करै था बार के पास

हार्ट फेल अब काय कू होगा,

रखवाय दियौ जब यार कै पास

शुक्रवार, 21 नवंबर 2025

मर्द, गीज़र और नहाना मेरा

चाहे कहीं के भी राजा का रोल करें लेकिन डायलाग बोलेंगे पंजाबी वाली हिंदी में ही, जिसे बोलते-बोलते दारा सिंह अपने नवजात शिशु (जो आगे चलकर मीताब-अच्चन बनेगा) की छाती पर उसका नाम लिखते हैं – मर्द। यह सीन देखकर ऐसी सिहरन-सी मन में दौड़ गई कि सर्दी की ठिठुरन ग़ायब हो गई अपने-आप। 

 

जब-कहो-तब-रो-पड़ने-को-तैयार चेहरा लिये जब निरूपा रोये अपने बच्चे को ना पाकर रोती है और उसकी आवाज़ भी चली जाती है, तब इस सीन को देखकर रोकते-न-रोकते मेरे एक बाल्टी गरम-गरम आंसू भी निकल पड़े। निरूपा रोये का रोना और मनमोहन देसाई का फ्लिम बनाना आज भी सफल रहा।

 

उसके बाद जो घोड़े ने कमाल दिखाया बच्चे को अनाथ आश्रम जा पहुँचाया, उसे देखकर तो शरीर में 200 वोल्ट का करंट ही दौड़ गया (इसी घोड़े पर दारा सिंह जैसे उछलकर बैठता है, देखना बड़ा होकर मीताब-अच्चन भी वैसे सवार होगा। मुझे पता है क्योंकि ये फ्लिम मैंने, पिछले नौ दिन में तीन बार देखी है)।

 

येई मीताब-अच्चन जब अपने पापा वाला ही डायलाग बोलता है – पीठ पर वार करोगे तो सीने पर खाओगे, तो सुनकर मेरी रगों में ख़ून का दौरा और तेज़ हो गया, गर्मी बढ़ गई।

 

फिर जब कमीनेपन की चिकनाई से चमकता चेहरा लिये प्रेम चोपड़ा डैलाग बोलता है कि – हमारा आधा ख़ून पानी है और आधा इंग्लिस्तानी है – तो इस डैलाग को सुनकर गुस्से के मारे मेरे शरीर में गर्मी का दौरा चढ़ गया और जी चाहा कि गला ही घोंट ना दूँ इसका!!!

 

फ्लिम चल रई थी और मेरा नहाना भी। तभी अचानक ठंडा पानी ठंडा लगने लगा, इतना कि सूईयों की तरह चुभने लगा। देखा कि मूए यूट्यूब ने फ्लिम रोककर ऐड चला दी है।

 

साबुन लगे हाथों से मोबाइल में स्किप का बटन बड़ी मुश्किल से दबा और मैं फिसलते-फिसलते भी बचा।

 

जब अमृता सिंह की एन्ट्री हुई तो रोमांटिक गर्मी से बाकी बचा स्नान सम्पूरन किया।  

लगता है यूट्यूब प्रीमियम लेना ही पड़ेगा। गीज़र से तो सस्ता ही पड़ेगा।

क्या कहते हैं आप?


शुक्रवार, 15 अगस्त 2025

असग़र वजाहत लिखित जिस लाहौर नई वेख्या की रवि तनेजा निर्देशित प्रस्तुति

असग़र वजाहत लिखित मशहूर नाटक जिस ल्हौर नई वेख्या ओ जम्मेआ ई नई का मंचन रवि तनेजा के निर्देशन में 14 अगस्त 2025 को दिल्ली के मंडी हाउस स्थित श्री राम सेंटर में हुआ। विभाजन की त्रासदी पर आधारित इस नाटक को देश की कई मंडलियाँ प्रस्तुत करती रहती हैं।

नाटक एक बुज़ुर्ग हिंदू महिला के चारों ओर घूमता है जो लाहौर की अपनी हवेली में अकेली रह गई है। लखनऊ से आया एक मुस्लिम परिवार जब उस हवेली में रहने आता है तो उसे पता चलता है कि उस हवेली में एक बुजुर्ग हिंदू औरत अभी भी मौजूद है। वह अपने घर को छोड़ने को तैयार नहीं, लेकिन आए हुए मुस्लिम परिवार को रहने की इजाज़त भी दे देती है। उस बुज़ुर्ग महिला से इस मुस्लिम परिवार का और मोहल्ले के सभी लोगों का एक भावनात्मक जुड़ाव पैदा हो जाता है। लेकिन कुछ पड़ोसी और इलाके के कट्टरपंथी लोग इस बात का विरोध करते हैं कि एक हिंदू महिला को पाकिस्तान में रहने दिया जाए।

यह नाटक विभाजन की त्रासदी को एक बहुत ही मानवीय दृष्टिकोण से दिखाता है। यह बताता है कि भले ही राजनीतिक और धार्मिक कारणों से ज़मीन का बँटवारा हो गया हो, लेकिन लोगों के दिलों से इंसानियत को मिटाना असंभव है। 

रवि तनेजा ने बूढ़ी महिला का क़िरदार बख़ूबी अदा किया। सभी अभिनेताओं ने अपने-अपने पात्रों के साथ न्याय किया। सेट पर और काम किया जा सकता था, लेकिन सेट की यह कमी अखरी नहीं। रविंदर मिश्रा की प्रकाश व्यवस्था और डालचंद की वस्त्र सज्जा ने नाटक के प्रभाव को सशक्त बनाया। दृश्य परिवर्तन के दौरान सजीव संगीत ने तारतम्यता बनाये रखने में अहम भूमिका अदा की। सूफ़ी कवियों और कबीर की वाणी को मुख्य रूप से इस दौरान गाया गया। कुछ पंक्तियाँ गुरु ग्रंथ साहब से भी ली गईं। नाटक के अंतिम हिस्से में बहुत देर तक कालिमा का रहना अखरता है। दृश्य खुलने में देर होती है।

इसे शायद संयोग ही कहा जाएगा कि पिछले कुछ वर्षों से 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका दिवस मनाया जाता है उसी दिन यह नाटक किसी सरकारी आयोजन का हिस्सा बने बिना प्रस्तुत हुआ। पिछले लगभग 25-30 वर्षों से खेले जा रहे इस नाटक की प्रासंगिकता सार्वभौमिक और सर्वकालिक है।

इस नाटक के बहाने शहर-ए-लाहौर प्रेम और बंधुत्व का प्रतीक बन जाता है। जिसने प्रेम और बंधुत्व न जाना, उसका पैदा होना बेकार है।

 


























https://youtu.be/T_o_Rcys3-8


गुरुवार, 14 अगस्त 2025

मित्र मुकेश मानस को लिखी गई नव वर्ष की शुभकामनाएँ

बहुत दिन बीते भाई तुमसे बात न कुछ हो पाई। जाने  क्या है तुम्हारा हाल अनिश्चित बीता यह सारा साल। हों ख़त्म सभी मलाल कहीं तो कुछ ठहराव आए।

सोचे कोई तुम्हारे भी सुख की, मन कहीं तुम्हारा भी लग पाए। 
नव वर्ष की शुभकामनाएं। 

27 December 2012