शनिवार, 6 जून 2026

 तुम तक पहुँचने का सफ़र

बहुत कठिन था

शाहराह को छोड़कर

एक पगडंडी पकड़नी थी

और ख़ुद से बाहर निकलकर 

तुम तक जाना था। 

कोई पुकार थी जिसे

अनसुना करने की कोशिश में

मैं खड़ा रहा बहुत दिनों तक

अपना रास्ता रोके

और जब चला ख़ुद को मारकर

तो अपनी लाश को ढोना पड़ा


लो आख़िर मैं तुम तक आ गया

सिर्फ़ यही देखने के लिये 

कि तुम हो ही नहीं


तो फिर जिसे मैंने देखा

वह क्या था

अनगिनत खपरैलें थीं

जो सीधी नज़र से देखने पर

चेहरा बनाती थीं तुम्हारा

देखने का कोई और कोण

था ही नहीं मेरे पास


देख रहा हूँ

वापसी का सफ़र और भी कठिन है

क्योंकि

इस बार तो मैं जानता हूँ

कि

वहाँ पहुँचने पर

मैं नहीं मिलूँगा। 

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