तुम तक पहुँचने का सफ़र
बहुत कठिन था
शाहराह को छोड़कर
एक पगडंडी पकड़नी थी
और ख़ुद से बाहर निकलकर
तुम तक जाना था।
कोई पुकार थी जिसे
अनसुना करने की कोशिश में
मैं खड़ा रहा बहुत दिनों तक
अपना रास्ता रोके
और जब चला ख़ुद को मारकर
तो अपनी लाश को ढोना पड़ा
लो आख़िर मैं तुम तक आ गया
सिर्फ़ यही देखने के लिये
कि तुम हो ही नहीं
तो फिर जिसे मैंने देखा
वह क्या था
अनगिनत खपरैलें थीं
जो सीधी नज़र से देखने पर
चेहरा बनाती थीं तुम्हारा
देखने का कोई और कोण
था ही नहीं मेरे पास
देख रहा हूँ
वापसी का सफ़र और भी कठिन है
क्योंकि
इस बार तो मैं जानता हूँ
कि
वहाँ पहुँचने पर
मैं नहीं मिलूँगा।
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