बुधवार, 23 सितंबर 2020

बावजूद भी!!!

 

23 September 2019


कल मम्मी-डैडी नहीं थे घर पर तो....


तो कल मैंने बहुत दिनों बाद टीवी देखा। 


अपने माँ-बाप से डर उतनी वजह नहीं है टीवी न देखने की। 


असल वजह यह है कि टीवी मम्मी-डैडी के कमरे में है जो ग्राउंड फ्लोर पर है। और मैं सेकंड फ्लोर पर रहता हूँ।


मैं रात दस बजे के बाद ही घर दाखिल होता हूँ तब तक मम्मी-डैडी सो चुके होते हैं और मुझे भी अपने कमरे में लेट कर लैपटॉप देखना होता है। 


मेरे बच्चे और प्रोमिला भी - जो तब तक सोये नहीं होते, मेरे आने का इंतज़ार करते हैं क्योंकि मेरे फोन का वायफाय लैपटॉप से जोड़कर कोई फ़िल्म-शिल्म देखी जाती है। 


मेरे फोन में अच्छा ख़ासा इंटरनेट डाटा है और स्पीड भी उसकी ठीक-ठाक है। प्रोमिला और बच्चे अपना डाटा ख़त्म करके मेरी उडीक (इंतज़ार) में बैठे रहते हैं। 


सुबह कुछ समय के लिए मम्मी-डैडी के पास बैठता हूँ तो घर-परिवार की बातें होती हैं, इत्यादि। तो टीवी उस समय चलाने का सवाल ही पैदा नहीं होता। 


मेरे कमरे में टीवी नहीं है। 

कारण यू अँडरस्टैंड वेरी वैल। 


दिन में या अर्ली ईवनिंग जब ये सब लोग घर में ग्राउंड फ्लोर पर होते हैं तो भी टीवी केवल कुछ ही देर के लिए देखते हैं। 

मम्मी-डैडी से डर केवल मुझे ही नहीं लगता।


वैसे टीवी लगभग सारा दिन चलता है। मेरे बापू को टीवी न्यूज़ देखनी होती है और वो एनडीटीवी को छोड़कर बाक़ी सभी न्यूज़ चैनलों की न्यूज़ें देखते हैं।

कारण यू अँडरस्टैंड वेरी वैल। 


उन चैनलों में जो थोबड़े बार-बार दिखाये जाते हैं उन्हें हमारे घर में और कोई देखना नहीं चाहता। ख़ैर..।


मम्मी-डैडी पंजाब से रात की ट्रेन से लौट रहे थे। वे केवल दो रातों के लिए घर से बाहर थे। तो दोनों रात हमें उनके कमरे में सोना था। कारण यू अँडरस्टैंड वेरी वेल। 


देश सुरक्षित हाथों में हैं बोलने वालों को सपोर्ट करते मेरे बाप को न जाने क्या हो जाता है जब रात नौ बजे के बाद वो मुझे बार-बार फोन करके मेरी लोकेशन जानना चाहते हैं और कहते हैं अज्जकल टैम बड़ा ख़राब ऐ छेती (जल्दी) घर आ जाया कर। ख़ैर...।


तो एक रात पंजाब में, और दूसरी रात वापसी के सफ़र में, मम्मी-डैडी घर से बाहर थे।


उनके पंजाब जाने का सफ़र दिन में ही पूरा हो गया था। सुबह पौने सात बजे की गाड़ी पकड़ वे दोपहर बाद तक गंतव्य स्टेशन उतर गए थे। 


मैंने अपने मोबाइल ऐप से दोनों की टिकट बुकिंग सीनियर सिटीजन कन्सेशन के साथ की थी और सीट प्रेफ्रेंस में विंडो लिखा था। मुए रेलवे ऐप को न जाने क्या हुआ एक को सीट नंबर 8 दिया और दूसरे को 18, यानी दूर-दूर। 


आप कह सकते हैं कि जो सीट अवेलेबल होगी वही मिलेगी। पर जनाब! जब मैं बुकिंग कर रहा था तो 452 सीटें अवेलेबल थीं जी। इन अच्छे दिनों में दो बुज़ुर्गों को आमने-सामने सीट भी न दे सकी रेलवे!! 

ख़ैर...।


मम्मी-डैडी दो रातों के लिए घर से बाहर थे और मुझे, प्रोमिला और हमारे एक बच्चे को नीचे, यानी ग्राउंड फ्लोर वाले कमरे में सोना था। 


पहली रात मैं घर जाते ही सो गया क्योंकि बहुत थका हुआ था। दूसरी रात थोड़ा-सा टीवी देख के सोया क्योंकि घर में जब घुसा तो बच्चे टेलीविजन लगाकर बैठे थे और केबीसी आ रहा था। 


मुझे जैसे यह मालूम नहीं है कि साउथ अफ्रीका की क्रिकेट टीम इंडिया आई हुई है, उसी तरह मुझे यह भी पता न था कि केबीसी अब भी आता है। 


तो उस समय केबीसी आ रहा था। 

शो के एंकर जिन्हें इस सदी का महानायक कहा जाता है, के सम्मुख एक ज़ोरदार अभिनेता की हट्टी-कट्टी बेटी - एक हीरोइन बैठी थी। वह सदी के महानायक के सम्मुख हॉट सीट पर एक उद्यमशील महिला के साथ बैठी थी। 


रानी पद्मावती की (कुछ लोगों के अनुसार) काल्पनिक या अवांतर-वास्तविक कथा पर आई फिल्म का पुरज़ोर विरोध करने वालों के आन-बान जैसा ही गाँव रहा होगा जहाँ यह उद्यमशील महिला पैदा हुई और पली-बढ़ी थी। जैसा कि शो से पता चल रहा था, उस घोर चाउवनिस्टिक समाज में रहकर भी ख़ुद को और साथी महिलाओं को आगे बढ़ाने, उनकी आर्थिक स्थिति सुधरवाने में उस उद्यमशील महिला ने उल्लेखनीय काम किया था।


जिस प्रकार के उसके कामों और सब महिलाओं के साथ से सबके वाकई और किसी नारेबाज़ी से दूर सच्चे विकास का काम वह करती आ रही थी, मुझे वह वामा वामपंथी प्रतीत हुई। 


उसने मार्क्स और समाजवाद भले न पढ़ा हो, मगर पद्मावती सरीखी-सुंदर, महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता की पक्षधर वह महिला समाजवाद और कम्यूनिज़्म के दर्शन को जी रही थी (बोले तो, आय फेल्ट लाइक दैट)। 


केबीसी में पूछे गए एक रामायण आधारित प्रश्न का सीधा-सादा उत्तर दमदार अभिनेता की वह हट्टी-कट्टी हीरोइन न दे सकी, न ही दे सकी उस प्रश्न का उत्तर वह उद्यमशील महिला ही, जिसके साथ थी बैठी वह हीरोइन। उस प्रश्न का उत्तर देने के लिए उन दोनों महिलाओं को लाइफलाइन रूपी एक एक्सपर्ट का सहारा लेना पड़ा जो कि येट अगेन एक महिला थी। उस एक्सपर्ट ने बचपन या कैशोर्यावस्था में देखे एक टेलीविजन सीरीयल का वास्ता या हवाला देकर बताया था कि हनुमान संजीवनी बूटी लक्ष्मण के लिए लाए थे। और जैसे लक्ष्मण की बची थी, इस लाइफलाइन से उन दोनों महिलाओं की जान बची थी। गोया वह महिला गंधमादन पर्वत से ही अवतरित हुई हो। 


हट्टी-कट्टी हीरोइन के इस आसान-सा जवाब दे पाने में अक्षम रहने को लोगों या ट्रोलों, जो भी आप कहें, ने हाथों-हाथ लिया और सोशल मीडिया पे दे पोस्ट-पे-पोस्ट पेलकर हट्टी-कट्टी हीरोइन को निंदाने लगे (इस सेन्टेंस को आप लास्ट वाले 'दे' के बिना भी पढ़ सकते हैं अगर चाहें)।


सोशल मीडिया पर उस उद्यमशील वामा की उद्योगिता की प्रशंसा में लेकिन एक भी पोस्ट न थी।


हैरानी इस बात पर भी थी कि उस मोस्ट ईज़ी क्वेश्चन का सिंपलेस्ट आन्सर वह उद्यमशील महिला भी न दे पाई थी किन्तु उसकी इस अज्ञानता को आराम से इग्नोर दिया गया। सबको शिक़ायत थी तो केवल हट्टी-कट्टी हीरोइन से जिसके पापा का नाम रामायण के चरित्रों में से एक पर था और चचा-ताऊ के नाम भी जस्ट लाइक दैट थे। और तो और, दमदार अभिनेता की बेटी हट्टी-कट्टी हीरोइन के घर का नाम भी रामायण था।  तो जनाब ट्रोलों ने तो ट्रोलना था और वे जी भर के ट्रोले भी।


ओह हो!! मेरी यह पोस्ट सुरसा के मुख की तरह बढ़ती जा रही है, या हनुमान की पूँछ की तरह लंबी होती जा रही है। 


अब तक वह बात नहीं आई जिसे लिखने के लिए यह पोस्ट शुरू की थी।


तो मैंने जब कई दिनों बाद टीवी देखा, और टीवी में उस समय आ रहा केबीसी देखा तो मैं क्या देखता हूँ कि अमिताभ बच्चन किसी बात को कहते हुए 'बावजूद भी' बोल रहे हैं। यानी शब्द 'बावजूद' के साथ शब्द 'भी' का भी इस्तेमाल कर रहे हैं।


मैंने सुना है कि 'बावजूद' के साथ 'भी' का प्रयोग नहीं होता क्योंकि 'भी' बावजूद में अंतर्निहित है।


एक समय टीवी पर सत्यमेव जयते नामक कार्यक्रम में मैंने अभिनय की खान आमिर ख़ान को भी 'बावजूद' के बाद 'भी' का प्रयोग करते देखा था। 


मुझे उस दिन कोफ़्त हुई थी। पर कोफ़्ते जो उस दिन घर में बने थे टेस्टी बने होने के कारण मेरी खीझ की एनर्जी  डाइवर्ट होकर खाने की तारीफ़ में कन्वर्ट हो गई थी।  


आमिर ख़ान से तो जो शिक़ायत थी, सो थी, पर अब अमिताभ बच्चन ने भी 'बावजूद' के बाद 'भी' बोल डाला। इस बात से मेरा कान्फिडेंस थोड़ा हिल गया, कि यार कहीं मैं ई तो गल्त नईऊँ? 


तो आज की रात, जब मैं यह पोस्ट लिखते हुए आधी रात के इस पार आ गया हूँ, मैं, प्रोमिला, हमारे ज्वाइंट फैमिली के बच्चे-कच्चे हमारे ऊपर वाले अपने कमरे में सो रहे हैं। और आज (यानी टेक्निकली कल) हमने लैपटॉप पर एक नहीं, पूरी दो-दो फ़िल्में देखीं। एक तो थी राजेश खन्ना और नंदा अभिनीत सस्पेंस फिल्म इत्तेफाक। और दूसरी में भी नंदा थी। दूसरी फ़िल्म का नाम था गुमनाम। 


फ़िल्म इत्तेफाक के एक सीन में जब मैंने इफ़्तेख़ार जैसे मँझे हुए अनुभवी अभिनेता को एक संवाद में 'बावजूद भी' बोलते देखा तो क़सम से मुझपे क्या गुज़री होगी अल्ला ही जानता है। 


तो अब आप ही बताइए भाईसाहब 

क्या 'बावजूद' के बाद 'भी' लगाना करेक्ट है?

मंगलवार, 25 अगस्त 2020

अच्छा हुआ

जो तुमने मुझे छोड़ दिया

ख़रीदनी तो न पड़ेंगी दो प्लेट चाट पकौड़ी की



गुरुवार, 25 जून 2020

बस स्टॉप पर खड़ा था ।
बस के इंतज़ार में।
बहुत देर से आई नहीं थी।

निराश और नाउम्मीद हो चुका था।
तभी भगवान ने मेरी बिना बोले ही सुन ली।
लो!
एक साथ दो बसें आ गईं।

एक साथ इतनी मेहरबानी बर्दाश्त न कर पाया।

समझ न पाया किसमें चढ़ूँ।
अनिर्णय से ठस्स खड़ा रह गया।
फिर जैसे अचानक होश आया।

पैर पहली बस की ओर भागे।
मन दूसरी बस की ओर भागा।

आख़िर पैरों को मन की माननी पड़ी।
पहली छोड़ दूसरी की ओर।
भागा।

लेकिन।
मेरे मन कछु और था वा ड्राइवर के मन कछु और।
रोकते-रोकते बस उसने आगे बढ़ा ली।

अब क्या होगा!!!
मेरे पैरों ने मेरे मन को माँभैन की गाली निकाली।
और पहली वाली की ओर भागे।
इस बार मन ने पैरों का साथ दिया।

लेकिन यह साथ कुछ काम न आया।
पहली वाली भी चल पड़ी।
निकल गई।
मैं खड़ा देखता रह गया।
छूट गई।

अगली वाली जब तक आए।
तब तक।
सोचा।
सस्पेंस और थ्रिल से भरपूर।
यह पोस्ट ही लिख लूँ।
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बुधवार, 24 अप्रैल 2019

कॉमन और वैल्थ का फासला मिट जाए इसी विल के साथ इति 19वाँ अध्याय

नाउ डोंट हारास्स अस ओ माईटी
गो ग्लासगो
लेट अस अवर डर्टी लिनेन धो

भैया कलमाडी ...
भैया....
ओ भैया...
(किसी स्टेडियम की फाल्स सीलिंग के नीचे बैठे रो रहें हैं चुपचाप, जो अब गिरने का नाम नहीं ले रही और कोई खबर भी नहीं बन रही)

और दीदी दीक्षित
दीदी...
दीदी प्लीज़
नहीं दीदी ऐसा नहीं करते
उदास मत हो

अगली बार भी तुम्हें ही वोट मिलेंगे
वोटर सारे डिसलेक्सिया से पीड़ित हैं
अभी तो चकाचौंध से चित्त हैं

अरे कोई खिलाड़ियों की तो बात ही नहीं कर रहा

अजी छोड़िए साहब खिलाड़ियों को कौन पूछता है
आजकल तो स्पोर्ट्स मैनेजमेंट का ज़माना है
बेटे को इसी में डिप्लोमा कराना है
और खेलगांव में बस जाना है

जाओ खिलाड़ियों डोंट वेस्ट टाईम
एशियाड की तैयारी करो
प्रेस - व्रेस में कोई बयान मत दो

गो

विजय सिंह
वर्ष 2010 में दिल्ली में हुए 19वें कॉमनवैल्थ गेम्स ख़त्म होने पर।  

15 अक्तूबर 2010

शनिवार, 29 दिसंबर 2018

एक्सीडेंटल था
उस पर किसी और का कंटरोल था
जे बातें ऐसे बता रए जैसे
आम लोगन कू पैले से पतो ई न था।
एक्सीडेंटल न होकर सुनियोजित होता तो उस पर किसी और का कंट्रोल
नहीं होता क्या?
जे वाला बेलगाम हैगा क्या?
बेलगाम कोई न होत्ता,
बस यू देखना पड़े के यो लगाम ससुरी है किसके हाथ मै।
आम जन के हाथ में लगाम न होती कभी। उनके हाथ में तो केवल लगान होता है
ये बात आम जन और मैंगो पीपुल सब कू मालूम है
कोई सिकायत भी न करता इस बात की ।
इसी को शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व कहवें (जादा एक्सप्लेन 'उखाड़ लेंगे' वाली पंक्ति के बाद किया गया हैगा)।
तो, जे जो नियोजित किया गया है न,
जे जो एक्सीडेंटल नाय हैगो,
इसके बी सब सीक्रेट सब कू मालूम ऐ।
इसके भक्तों को बी मालूम हैंगे (जैसे उसके भक्तों को मालूम थे)।
कई तो इसके भक्त हैं ही इसीलिए के उन्हें वो सब मालूम है।
उन भक्तों को चईए ई ऊ।
विकास लेके ऊ के करेंगे?
स्वच्छता अभियान के उनके अपने मतलब हैंगे।
सब कौ पतौ जे नियोजित है और आन वारा बी नियोजित ई होएगो।
एक्सीडेंटल बी होयगो तौ हम्म के उखाड़ लेंगे।
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शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का अर्थ है आप इन्सेक्योर रहें और वो सेक्योर।
आप सिर्फ इसी बात से सुरक्षित महसूस करें के उसकी निगाह आप पर न पड़ी।
वरना वो जब चाहे आपको मार दें और आप चूँ न करें और कातिलों को थैंक यू कहें कि वो और बुरी तरह से आपको मार सकते थे लेकिन उन्होंने बख्श दिया।
आपमें ऐसी दिव्य भावना की मौजूदगी को वो समय-समय पर दंगों, इंकुइरी (inquiry) इत्यादि से टेस्ट करता रहता है और शासित होने का शार्ट टर्म कोर्स आपको करवाता रहता है।
आप डर-कर-मर-कर टाइम पास करते हैं। सामने से आता कोई आपका कुशल मंगल पूछता है तो आप कह देते हो - ठीक ही चल रहा है सब।

शुक्रवार, 28 दिसंबर 2018

एक न एक दिन सब यहीं छोड़ जाना है। यह तो फिर भी होटल का कमरा है।
इंसानी फितरत ही है जहाँ रुके वहाँ अपना घर बना लेने की, चाहे ट्रेन में मिली बर्थ ही क्यों न हो।
मुझे लगता है, क़ैदी भी रिहा होने से पहले, या फांसी के लिए लेकर जाए जाने से पहले, अपनी कोठरी को मुड़कर ज़रूर देखता होगा जो जैसी भी थी, घर थी।
जिस दिन आपने होटल का कमरा छोड़ना हो, उस दिन सुबह से ही कमरे से अलग वाइब्रेशन आने लगती है। एक उजाड़ जैसा महसूस होने लगता है।
कमरे से निकलने से पहले आख़िरी बार बिना ज़रूरत के, बाथरूम यूज़ कर लेने को जी सा करने लगता है।
बाहर निकलने से पहले एक बार एक नज़र पूरे कमरे और अपने बेड पर डालता हूँ और लगता है जैसे मेरे जाने को कमरा भी महसूस कर रहा है।
मैं उससे कहना चाहता हूँ दोस्त मैं फिर आऊँगा, मगर ऐसा कह नहीं पाता। 20 से 29 अप्रैल 2011 में अहमदाबाद के जिस होटल में ठहरा था, उसका नाम भी याद नहीं हालांकि लोकेशन याद है, पर ड्राइवर का कहना है उधर बहुत जाम होता है।
कमरा भी इस बात को समझता है, इसलिए कोई ज़िद या निवेदन या आग्रह नहीं है उसकी उदासी में।
अभी-अभी इस होटल में अपना आख़िरी लंच लिया है, मगर खाना बड़ी मुश्किल से गले से नीचे उतरा है। हालांकि सब कुछ वही और वैसा ही है, जैसा रोज़ होता है।
29 September 2018
आज की समस्याओं का हल
कल देगा
झोला उठाकर चल देगा।