ख़ुद को बार-बार समझाता हूँ कि बिल्कुल बेसमझ हूँ फिर भी इतनी-सी बात समझ न पाता हूँ कि बिल्कुल बेसमझ हूँ।
वो समझदार है इतना है समझ में आता, मैं बिल्कुल बेवकूफ़ हूँ यही पता नहीं चल पाता।
अपना बना कर ठगा यह मुझे पता चल जाता है। पर बार-बार ठगे जाने में मुझे क्यों मज़ा आता है बस यही समझ नहीं आता।
घेरेगा मुझको फिर से एक व्यूह बनाकर, दरअसल वो मुझसे बड़ा बेवकूफ़ है। नहीं समझता क्या कि मैं उससे हरदम घिरा पड़ा हूँ?
अकल वालों के चोंचले भी देख लिए हैं ख़ूब। अब वे बेअक्ली की मीठी झील में देखें डूब। परम् सत्य वे पा जाएँगे, ख़ुद ही ख़ुद में समा जाएँगे।
14 अक्तूबर 2018
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