बुधवार, 2 सितंबर 2026

तेरा कुछ सामान

6 मई 2020 

वो छतरी पापा ने कबाड़ी को बेच दी

जिस एक अकेली छतरी में हम
आधे-आधे भीग रहे थे
आधे सूखे आधे गीले
सूखा तो तुम ले गई थी
गीला मन शायद पेन ड्राइव में सेव किया था
वो फॉरमैट करनी पड़ी क्योंकि
बच्चे का होमवर्क ज़रूरी था
तुम्हारे जिस ख़त में लिपटी रात पड़ी थी
उसे परछत्ती पर रखे गए सामान के साथ एक पुराने संदूक में रखा था।
दुष्यंत की कविता पढ़कर जोश में आकर कई सालों बाद जब संदूक खोला तो उसमें अनगिनत काग़ज़ों, स्कूल-कॉलेज की कविताओं के नीचे दबे उस ख़त को खोलते ही वो पता नहीं कब से बुझी हुई रात उसमें से घबराकर निकल भागी। जाने कैसे और कब दीमक खा गई थी काग़ज़ों को यहाँ-वहाँ।
सावन के कुछ भीगे-भीगे दिन वापिस माँगती हो?
जाने भी दो न अब।
पतझड़ लेकर क्या करोगी, उसकी कमी तो तुम्हारे यहाँ भी न होगी। सूखे पत्तों को हवा उड़ा ले गई। रास्ते में ही तो तुम्हारा घर था। देखो कहीं तुम्हारी देहरी पर कोई गिरा पड़ा हो।
वो चांद की रातें जिनकी गिनती तुम्हें याद है
और सच्चे झूठे वादे सब
याद करो तुम अपने साथ पहले ही ले गई हो।
देखो तुमने किसी और के पास न रखवा दिए हों।
दफ़ना तो तुम सकी न थी, उन्हें।
कच्ची मेहंदी तो कई बार मिट चुकी है। उधर तुम्हारे हाथ गीले आटे में सने हैं और इधर मेरे हाथ ठसाठस भरी लोकल बस का डंडा पकड़ रखने से सुन्न पड़ चुके हैं।
याद नहीं जो तिल था
वो मेरे कांधे का था या तुम्हारे। मुझे मेरा तिल दिखता नहीं। सर्वाइकल के कारण गर्दन अब मुड़ती भी नहीं। वैसे भी अब इन तिलों में तेल नहीं।
तो फ़ाइनली
तुम्हारा कोई सामान
मेरे पास नहीं पड़ा है।

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