मंगलवार, 24 अगस्त 2021

 https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=10227002675232436&id=1221171385


कृपया ध्यान दें, यह पोस्ट रोमांटिक नहीं, अपितु मेरे देशप्रेम के बारे में है


जब दुनिया का काफ़िला अपनी रफ़्तार से हरक़त में था तभी सड़क पर चलता हुआ डॉगी मुझे दूर से ही देख रुक गया था। पता उसे चल गया था कि मैंने एक तस्वीर लेने के लिए मोबाइल निकाला है। नादान श्वान इस बात से अन्जान था कि मेरी कोशिश ज़मीन से आसमान तक गुज़रते पल की छायाप्रति लेने की है। 


सड़क पर टहलते हुए जब मैंने चाँद देखा, तो सोचा तुम छत पर दिन में सूखने के लिए फैलाए गए और अब आधे सीले रह गए कपड़ों और डबल बेड की धोई गई शीटों को उतारने गई होगी और न चाहते हुए भी, मुझ पर झल्लाते हुए भी, एकाध बार तो चंद्रमा की ओर तुमने भी देख ही लिया होगा।


चंद्रमा को देख कर तुम अभी भी याद आती हो। हालांकि अभी घर से निकले मुझे ज़्यादा समय न हुआ था, और निकलकर भी, तुमने सैंडविच बनाने के लिए जो आधा किलो खीरे मंगवाए थे, और भरता बनाने के लिए जो गोल बैंगन मँगवाए थे, डैडी मम्मी की गैस्ट्रिक प्रॉब्लम को ध्यान में रखकर जो जीरा ड्रिंक की बोतलें मँगवाई थीं उन्हें डिलीवर करता हुआ मैं फिर से तुम्हें देख आया था तो भी तुम्हारी याद आने लगी थी और देखो मुझे! चंद्रमा को देखते हुए मैं तुम्हें सोचते हुए यही सोच पा रहा था कि चाँद को देखा तो होगा तुमने, पर मुझ पर झल्लाते हुए। जबकि दिन के फ़र्स्ट हाफ में राखी के लिए आई मेरी बहन, जीजा और भानजी की आवभगत के बाद जब तुम संडे के संडे धुलने वाले डेढ सौ कपड़ों और बेडशीट्स को वाशिंग मशीन में धो रही थीं, तो मैं उस समय राखी से सजी कलाई लिए हाथों से बर्तन धो रहा था और उसके बाद धुले हुए कपड़ों की बाल्टी लेकर बरसाती दिनों की सड़ी हुई उमस भरी धूप में छत पर नंगे पांव गया था तुम्हारे साथ। पतंग उड़ाने में सहूलियत की ख़ातिर कपड़े सुखाने की जो रस्सी टीनेज में दाखिल होते हमारे दोनों लड़कों ने निकाल दी थी उस रस्सी को कुशलता से पुनः बाँधकर और कपड़े सूखने के लिए फैलाने में तुम्हारी हेल्प करके और इधर-उधर बिखरी पड़ी चिमटियों को कपड़ों पर लगाने के लिए ढूँढ-ढाँढकर तुम्हें देकर ही मैं सोनीलिव पर हॉलीवुड की फ़िल्म 'ऐज़ गुड ऐज़ इट गेट्स' के बचे हुए आख़िरी तीस मिनट्स देखने नीचे कमरे में आया था। रात को उन्हीं कपड़ों को रस्सी से उतारते हुए तुम मुझ पर गुस्सा हो रही होगी ऐसा मैंने सोचा, क्योंकि तुम्हें नीचे जाकर खाना भी बनाना था।


फिर एक और जगह मुझे चाँद दिखा तो मैंने फिर तस्वीर उतार ली। घर पर आकर यह जानते हुए भी कि तुम नीचे रसोई में मम्मी की निगरानी में खाना बना रही हो, तुम्हें देखने छत पर गया। 


वहाँ जाकर देखता क्या हूँ कि पड़ोसी के मकान की छत के ऊपर चंद्रमा सुशोभित है। लेकिन उस छत पर लगे तिरंगे को देख मेरे मन में पहले से ही व्याप्त राष्ट्रप्रेम ऐवरी अदर थॉट को एक तरफ़ ठेलकर हिलोरें लेने लगा। मैंने सन्नद्ध होकर छत पर अँधेरे भरे सन्नाटे में गर्व से राष्ट्र गान गाया और छत से नीचे उतर आया।


जय हिंद!!

22 अगस्त 2021

शुक्रवार, 13 अगस्त 2021

 उसकी याद में रात भर रोता रहा 

नाइट शिफ्ट के बाद दिन भर सोता रहा

13 August 2018

रविवार, 8 अगस्त 2021

 सब जानते हैं राम मंदिर से क्या होगा।


भक्तों की वालों पर जाकर देख आया हूँ। सब यही कह रहे हैं टूरिज़्म को बढ़ावा मिलेगा, आसपास के लोगों को बिज़नस मिलेगा। 


इसका मतलब यह भी है कि रोज़गार देना इनके बस का नहीं। इनकी सरकार मंदिर भरोसे ही है। अंध-धार्मिकता से ही इनका ख़ुद का रोज़गार चल रहा है, ये ख़ुद उसी के भरोसे सत्ता में हैं। कोई रचनात्मक कार्यक्रम इनके पास नहीं है।


एक तरफ़ पूरा विश्व आगे आने वाले समय की चुनौतियों को ध्यान में रखकर बिज़नेस और अन्य गतिविधियों के नए तरीकों से ख़ुद को लैस कर रहा है, नए माडल तैयार कर रहा है।


दूसरी तरफ़ यह लोग हैं जो मंदिर के आसपास रोज़गार ढूँढ रहे हैं - यानी नए डिंगीनुमा होटल चलाना जिनमें बाल या टीनेज श्रमिकों की भरमार होगी जिन्हें हम प्यार से छोटू कहते हैं। 


दूसरा रोज़गार होगा मंदिर तक जाने की सड़क पर रामनामी दुपट्टों, कंठीमाला, शंख प्रसाद की थाली, फूलमाला, और राम जी की फोटू बेचने तथा राम के नाम पर भौंडी फ़िल्मी धुनों पर गाए गए गीतों की एमपी थ्री की प्रोडक्शन व बिक्री। 


इन तथाकथित हिंदुओं में से कोई माई का लाल बता दे कि अपने बच्चे को ऐसे रोज़गार में डालना चाहेगा वो। 


और मज़ेदार बात यह भी है कि ये लोग मुसलमानों को मिली पाँच ऐकड़ ज़मीन  पर अस्पताल या स्कूल बनवाने की सलाह दे रहे हैं।

8 अगस्त 2020

बुधवार, 21 जुलाई 2021

 जीवन में जो कुछ भी है 

सब कुछ

सहर्ष तो नहीं स्वीकारा है 

पर जो है 

सो है ही 

और थोड़े-बहुत हेर-फेर के साथ 

रहेगा भी 

तो जैसे-तैसे कर लेने के बाद स्वीकार 

खोजा सुख खीझते-छीजते 

ख़ाली गुल्लक को हिला-हिलाकर

और सच मानिए थोड़ा बहुत पा भी गया शायद 

ख़ाम-ख़याली में 

ख़ाली थी 

पर तोड़ नहीं पाया गुल्लक 

तोड़ूँगा भी नहीं 

आशावादी जो ठहरा 

उल्लू का पट्ठा।

इसलिए जो कुछ मिला 

उसी में हर्ष ढूँढने की ताल-बेताल कोशिश की 

और जो नहीं मिला 

उसमें भी। 


दुख तो इस बात का है 

यह मेरे अकेले की दास्तान नहीं।


21 July 2015



शुक्रवार, 9 जुलाई 2021

 


https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=10213654595258779&id=1221171385


कभी-कभी मेरा अपनी पत्नी से भी झगड़ा होता है। 


कहा-सुनी तो कई बार हुई है, दो-एक बार हाथ भी उठा है। 


मेरे अंदर एक बुनियादी मर्द कभी-कभी सभ्य साँप की तरह फन उठाता है। लेकिन यह सब इतना क्षणिक होता है कि मैं ख़ुद जान नहीं पाता कि एकाएक यह हुआ क्या।  


एक लंबे समय से ऐसा हुआ नहीं लेकिन आगे कब हो जाए पता नहीं। 

आप चाहें तो बिन मांगे जो सर्टिफिकेट मुझे देना चाहें, दें। 


यह सब ऐसे ही है कि हम कितने ही सेक्युलर क्यों न हों, हिन्दू होने के प्रत्यक्ष और परोक्ष लाभ लेने में हमें कोई गुरेज नहीं होता। कम-से-कम इतना आश्वस्त तो होते ही हैं हम कि अल्पसंख्यक न होने के कारण दंगों में तो नहीं ही मारे जाएंगे। ज़ात-पात को कितना भी न माने पर ब्राह्मण होने के लाभ जो चुपचाप बिना कहे हमें मिल जाते हैं उन्हें हम लात तो नहीं मार देते न? तो जो मर्दवादी सेटअप में हम रहते आएँ हैं उससे एकदम से छुटकारा कैसे मिलेगा भला?  


जो हो ऐसा तो कभी नहीं हुआ कि उसे ख़ून-वून निकला हो। बल्कि ख़ुद मुझे बेहद तकलीफ हुई क्योंकि गुस्से का अचानक ज्वार आपके अपने शरीर को काफी नुकसान पहुँचाता है बनिस्पत सामने वाले के। कई बार अचानक गुस्सा आने के बाद मैं बहुत देर तक ऊर्जा रहित कटे पेड़ की तरह गिरा रहा हूँ। दाँत भिंचने के बाद जबड़े वगैरह में भी काफी दर्द-वर्द होता रहा है मुझे। 


मैंने प्रोमिला से कहा भी है कि यार कभी मुझे एकदम से गुस्सा आ जाए तो मुझे बातचीत में उलझा लो, मेरे सवालों का जवाब देते जाओ। और तब मैंने महसूस किया है कि गुस्सा आने के बजाए हमारे बीच डिस्कशन होने लगता है। मैंने उससे कहा है कि देखो यूँ समझो कि मैं एक बीमार आदमी हूँ।


बचपन से चिड़चिड़ा रहा हूँ मैं। स्कूल में सहपाठियों से काफी मार खाई है और बाप ने भी खूब जी भर के पीटा है। चिड़चिड़ा इतना था कि डैडी मुझे पापड़ी कहते थे और आज भी कभी-कभी कह देते हैं। 


बहुत-सी अच्छी चीज़ें-सपने-प्रेमिकाएँ मेरे देखते-देखते, मेरी होते-होते छिन गई हैं। आज तक यह चला आ रहा है। 


मने अपने लिए सहानुभूति पैदा करने की कोशिश कर रहा हूँ आपके मन में। 


एक बार तो बाप की पिटाई से विद्रोह कर घर से भाग भी गया था। पर तीन दिन में वापस आ गया। एक्चुअली घर की याद बहुत आ रही थी। क्योंकि मीठी यादें ज़्यादा थीं। 


मेरी माँ की तब जो हालत बिगड़ी थी आज तक उस जलाल में वापस न आ पाई। और बाप तब के बाद से बिलकुल निरीह सा बन गया। बहुत तकलीफ पहुंचाई मैंने उन्हें। मैं ऐसा अपराधी हूँ कि वे मुझे कोई सज़ा भी नहीं दे सकते और मेरे अपराध की सज़ा खुद ही भुगत रहे हैं। संतान भी क्या चीज़ होती है न!  


आज सुबह बेटे को एक थप्पड़ जमाया। वो हैरानी से मेरी तरफ देखता रहा। 


नौ साल का वह लड़का मेरे थप्पड़ से रोने के बजाए सोच में पड़ गया कि यह जो मेरा बाप है मुझसे इतना प्यार करता है तो फिर कभी-कभी मारता काय को है। दीदियों को कुछ नहीं कहता। 


पर एक मिनट न लगाया उसने यह सब भूलने में और उसके बाद हम बाप-बेटा साथ में नहाए और उसने मेरे थप्पड़ को कोई भाव न देते हुए अल्टीमेटम दे दिया कि बाप 

जो माँगूँगा लाकर दोगे आप। 

समझे? 


मेरी क्या बिसात कि न समझूँ। 


हाँ भई लड़ाई होती रहती है हम दोनों पति-पत्नी में। पर हम दोनों ही एक-दूजे के बिना नहीं रह सकते क्योंकि मीठी यादें ज़्यादा हैं। 


जब मैं यह पोस्ट लिख रहा हूँ मेरी बीवी इसे साथ-साथ पढ़ रही है मेरे कंधे पर अपना गाल टिकाए। वो हँस रही है क्योंकि वो जानती है मुझे कि मैं उससे क्षमा मांगने में एक क्षण नहीं लगाता और पिछले दसेक वर्षों में तो ख़ुद को बेहद बदलने की कोशिश की है मैंने। 


एक अच्छी बात यह रही कि हमारे बीच लड़ाई-झगड़े बेहद आम सी बातों पर हुए न कि किसी गैर औरत या मर्द के पीछे। और न ही यह लड़ाई कभी पैसे के पीछे और न ही उसके मायके वालों को लेकर हुई। दहेज-वहेज का मामला भी रहा नहीं कभी। 


और यह भी कि इस पोस्ट को लिखते समय बिस्तर बिछाने की बात पर हमारी लड़ाई होते-होते बची। 


पोस्ट ठीक से लिख पाऊँ और सच स्वीकारने का माद्दा मुझमें रहे इसलिए प्रोमिला ने खजूर, गुड़ के सेव, पापड़ी और सफ़ेद मीठे फुल्ले-से जिन्हें कई बार चने के साथ खाया जाता है, मेरे पास रख दिये हैं ताकि मैं खाते-खाते लिखूँ और स्टेमिना न लूज़ कर जाऊँ। 


मेरे जीवन में जो चंद बेहद अच्छी बातें-चीज़ें हुई हैं प्रोमिला उनमें से एक बेहद आशीर्वाद-स्वरूप मुझे मिली है। उसे क्या मिला है, वो जाने। 


अब मैं किसको जाकर पाठ पढ़ाऊँ और किसकी निंदा-आलोचना कर ख़ुद को उल्लू का पट्ठा प्रगतिशील साबित करूँ।

गुरुवार, 20 मई 2021

 दिल की पुकार तुम तक पहुँचाने में फेफड़े भी मिरे हलकान हुए

पर तुम्हारे कानों में सुनने का जिगर गुर्दा न था।



24 May 

हलकान हुए फेफड़े भी मिरे
पहुँचाने को आवाज़-ए-दिल
पर तुम्हारे कानों में
सुनने का जिगर गुर्दा न था।

शनिवार, 10 अप्रैल 2021

अनुपमा धर्मेंद्र देवर और देवेन वर्मा

 हृषिकेश मुखर्जी निर्देशित हिंदी फ़िल्म  'अनुपमा' देख रहा था कि फ़िल्म में देवेन वर्मा की एन्ट्री आते ही फ़िल्म आगे देखने के बजाय, इस फ़िल्म को देखने पर जो दिलचस्पी बढ़ रही है आपसे शेयर करने का लोभ हुआ।

10 अप्रैल 2020

मैं हैरान हूँ कि यह फ़िल्म मैंने अब तक क्यों नहीं देखी थी। शायद इसलिए क्योंकि मैंने बहुत कम फ़िल्में देखी हैं। 


संभवतः यह हृषिकेश दा की पहली निर्देशित फिल्म है। इसे उन्होंने बिमल दा ( विमल रॉय) को समर्पित किया है जिनके वे असिस्टेंट थे।


अभी तक की फ़िल्म बेहद नपीतुली है। खिड़की के परदे तक आधा इंच फ़ालतू नहीं हिलते। अभिनेताओं की भाव-भंगिमाएं ग़ज़ब तौर पर संयत और स्वाभाविक हैं। कैमरा मूवमेंट बिल्कुल स्मूद और सधी हुई। कैमरा प्लेसमेंट भी मन के भावों को उभारती हुई। हेमंत कुमार का  संगीत फ़िल्म की गरिमा और भावों को और स्पष्टता से मन तक ले जाता है।  


फ़िल्म में जैसे ही देवेन वर्मा दाखिल होते हैं, मुझे याद आया शर्मिला टैगोर, देवेन वर्मा और धर्मेंद्र ने फ़िल्म 'देवर' में भी एक साथ काम किया है। 


फ़िल्म 'देवर' 'अनुपमा' से पहले आई थी या बाद में, यह मुझको ध्यान नहीं। चूंकि मैंने पहले 'देवर' देखी है, इसलिए कृपया मेरी क्रोनोलॉजी इसी प्रकार से समझिए।


'देवर' अपने कथ्य को लेकर मेरे लिए एक हिंदी फ़िल्मों के संबंध में एक इलहाम जैसी थी। भला किस फ़िल्म में ऐसा देखा होगा कि शादी के लिए लड़की देखने आया हीरो लड़की से मोंपासा के साहित्य पर सवाल पूछे? और ख़ास बात यह कि हीरो को ख़ुद मोंपासा के साहित्य का कोई अता-पता नहीं है, इस बात पर वह नर्वस है। प्लीज़, मैं फ़िलहाल जेंडर क्वेश्चन को यहाँ डिस्कोर्स में नहीं ला रहा। वरना बात किसी अन्य दिशा में मुड़ जाएगी। 


तो 'देवर' में देवेन वर्मा ने जिस तरह का खलनायकी क़िरदार निभाया है वह उनकी अभिनय क्षमता की बेहतरीन बानगी पेश करता है। इससे पहले मैं उन्हें हास्य कलाकार ही जानता था। 


'देवर' से पहले धर्मेंद्र की एक फ़िल्म आई थी 'फूल और पत्थर'। निर्देशक ने धर्मेंद्र की हीमैन जैसी, ग्रीक गॉड्स से मेल खाती शानदार पर्सनैलिटी को इस फ़िल्म में अत्यंत ख़ूबसूरती से इस्तेमाल किया था। यह फ़िल्म धर्मेंद्र के लिए भी संग-ए-मील साबित हुई। धर्मेंद्र चाहते तो एंग्री यंग मैन जैसी छवि में बंध सकते थे लेकिन नहीं। 'फूल और पत्थर' के बाद 'देवर' आई जिसमें संस्कारों और परिस्थितियों के आगे मजबूर व्यक्ति का सजीव चित्रण धर्मेंद्र ने अपनी अदाकारी के ज़रिए किया है। 


धर्मेंद्र अभिनीत 'फूल और पत्थर' के सामने अमिताभ बच्चन अभिनीत 'ज़ंजीर' फिल्मांकन, कथ्य और उद्देश्य के दृष्टिकोण से काफ़ी कमज़ोर फ़िल्म है बाय द वे। धर्मेंद्र जिस प्रतिष्ठा के हक़दार थे वह उन्हें नहीं मिली। जिस तरह की फ़िल्में उन्हें ध्यान में रखकर लिखी जानी चाहिए थी, नहीं लिखी गई। कहना चाहिए कि धर्मेंद्र की ज़मीन से जुड़े रहने की प्रकृति और स्वाभाविक विनम्रता भी उनकी अपनी संपूर्ण संभावनाओं का खनन करने में बाधा बनी होगी। ख़ैर...। 


बैक टू 'अनुपमा'

शर्मिला टैगोर का पर्सोना एस्टैब्लिश हो चुका है। 

देवेन वर्मा अपने पात्र की पृष्ठभूमि के साथ पट पर प्रस्तुत हो गए हैं। धर्मेंद्र अभी तक नहीं आए हैं। आने वाले होंगे। 

फ़िल्म देखने में मज़ा आने वाला है।