शुक्रवार, 30 मई 2025

मैं जहाँ था वहीं हूँ

बस मेरे पैर तले की 

ज़मीन खिसक गई है

रविवार, 18 मई 2025

तुम्हारी याद का समंदर

तुम्हारी याद का समंदर कभी सूखता नहीं 


दिन कट जाता है वजूद की लड़ाई में 

संध्या समय जब कटी-फटी लौटती हूँ देहरी के इस पार 

अब तक शांत सरोवर सरीखा, मौन, तुम्हारी स्मृति का रत्नाकर 

प्रतीक्षारत, सुप्त ज्वालामुखी अचानक से भभक उठता है, जी उठता है, 

ठाठें मारने लगता है सागर 

जिस की लहरों में डूबती-उतराती भीगती पूरी-की-पूरी नमकीन हो जाती हूँ मैं

तुम्हारी याद का समंदर कभी सूखता नहीं


जी उठते हैं वो मेरे सभी घाव, मन पर पड़ी खरोंचें मुझसे बात करने लगती हैं

पपड़ियों के बीच से ख़ून का रिस-रिसकर बहना मेरे ज़िंदा होने का सबूत बन जाता है

लहरें हैं या वक़्त के नाख़ून हैं 

तुम्हारी याद का समंदर कभी सूखता नहीं


नमक से भीगा जल मेरी आँखें अर्पित करती हैं तुम्हें संध्या वंदन में

जान गई हूँ नहीं पहुँचता वह अर्घ्य तुम्हें फिर भी  

तुम्हारी याद का समंदर कभी सूखता नहीं 


हर रोज़ निकलकर आते हैं मेरे सामने ही दाग़-ए-निहाँ

मुस्कुराती हूँ

पार कर रही होती हूँ सोच के दरिया को 

कि मैं नींद में हूँ

तुम्हारी याद का समंदर कभी सूखता नहीं 


जब अमावस होती है 

घुप्प अंधेरे के आवरण में विलीन हो जाता है मेरा अपना वजूद 

मैं हवा-सी हल्की ख़ुद से जुदा 

अनिश्चित असहाय 

अपने नन्हें से अहम को बचा ले जाना चाहती हुई इस स्वार्थी जगत के सत्तापिपासु गलियारों में जो लोग मुझे कमोडिफाई करके बस एक चीज़ की तरह देखते हैं मेरे आर-पार अमावस की रात उनकी चमकती हुई उनकी खा जाने वाली नज़रों से बच बचाकर लड़खड़ाती कभी सहमकर उनकी ज़द में आ जाती हुई  मैं 

जान तो गई हूँ तुम अब नहीं हो, दीखते नहीं कहीं मेरे मन की अंतस गहराईयों के स्वामी होने के बावजूद, 

मैं ख़ुद को तैयार करने लगती हूँ कि अब जीना तुम्हारे बिना ही होगा मुझे लेकिन 

तुम्हारी याद का समंदर कभी सूखता नहीं 


लहरें रुकती नहीं

मैं जो तुम्हारी लहरों के सहारे पार उतरने की विवशता को ही तुम्हारा आगोश समझकर इस दुनिया को बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल समझे बैठी थी 

अमावस की रात समंदर भी दीखता नहीं

साहिल पर खड़ी मैं तुम्हारी लहरों के शोर से जान जाती हूँ 

तुम्हारी याद का समंदर कभी सूखता नहीं


इस तरह फिर-फिर तुम्हारी याद के पारावार में डूबती हूँ शायद जानबूझकर या फिर मेरी ख़ुद पर ही कोई मर्ज़ी चलती नहीं और ज्यों-ज्यों दवा करने का साहस करती रही मर्ज़ बढ़ता गया, 

देखती क्या हूँ कि हर पगडंडी तुम तक ही ले जाती है और नई राह पर चलने का दम समेटती हूँ देखती हूँ क्या होता है

तुम्हारी याद का समंदर कभी सूखता नहीं


बुधवार, 30 अप्रैल 2025

 1 August 2012

पचास रूपए का पास बनाम यह माटी सभी की कहानी कहेगी

पिछले रविवार दिन में एक ज़रूरी काम से रोहिणी जाकर वापस आना था और डीटीसी का 50 रूपए का पास सुबह ही बनवा लिया था.  सच बताऊँ तो दोपहर तक पचास से ज्यादा रूपए का सफ़र तय कर भी लिया था और घर पर वापिस पहुँच भी गया था.  पर उस पास को यूज़ करने, यूज़ क्या वही पुरानी मिडल क्लास मेंटेलिटी, बुरी तरह से उसका दोहन करने के चक्कर में मेट्रो नहीं ली जबकि जल्दी घर वापसी के बाद  बच्चो को भी समय देना था. पर बनवा जो रखा था पास पचास रूपए का.

कॉलेज के दिन भी याद आए जब आल रूट पास में पूरी दिल्ली नाप लेते थे. अच्छा भी लगा की दिल्ली के उस हिस्से में कम जाना या लगभग न ही जाना होता है. अब तो खैर मेट्रो की वजह से दक्षिण दिल्ली वालों को रोहिणी और द्वारका दूर नहीं लगते पर एक ज़माने में तो यह जगहें परदेस लगती थीं. ज्यादा पुरानी बात नहीं है बस सन  दो हज़ार एक या दो की बात है,  एक बार जब दिल्ली विकास प्राधिकरण ने द्वारका में अपने उद्यानों का प्रबंधन दिखाने के लिए पत्रकारों का एक दौरा आयोजित किया था.  डिप्लोमा कोर्स करने के बाद भी किसी अख़बार में जगह नहीं मिल पा रही थी तो 'नेशनल हेराल्ड' में बतौर ट्रेनी प्रश्रय मिला था.  अब तो नेशनल हेराल्ड भी बंद हो गया है.  उन दिनों मुझे उस दौरे की कवरेज के लिए भेजा गया था. तो द्वारका पहुंचकर विभिन्न उद्यानों को देखते हुए रास्ते में डी टी सी की एक बस देखते ही कुछ पत्रकार भाइयों ने हैरानी मिश्रित चुटकी लेते हुए कहा था कि 'अरे! वो देखो! डी टी सी की बस!'   

खैर, शाम को नियान रौशनी में चमकती दिल्ली के उस हिस्से की रौनक ही निराली थी।

बसें बदल-बदल कर गया और बसें ही बदल-बदल कर आया। बीच में एक जगह ग्रामीण सेवा की टेम्पुलिया में पांच रूपए देने पड़े, बहुत खटका। जब जेब में पचास रूपए का पास हो तो ट्रेवल पर पैसे खर्चने वाला बेवक़ूफ़ ही कहलाएगा न मिडल किल्लास के हिसाब से।

एक और बस बदलते हुए रास्ते में अवंतिका नामक उपनगर में थक-हार के एक जगह जलजीरा भी पिया। उस आदमी के पास उस जल को पीने के वास्ते सिर्फ महिलाएं ही खड़ी थीं। मैंने डरते-डरते उस भाई से पूछ लिया कि वो मुझे भी जलजीरा पिलाएगा या मैं जीरे-सा मुंह ले के कहीं और जल मरूं. पर उसने मुस्कुरा कर 10 रुपल्ली झडवा लिए और पिला दिया मुझे तैरती बूंदी वाला (या शायद मुनक्के वाला) जलजीरा.

इन चिर-प्यासे नयनों के सामने
सदैव सद्यस्नात-सी फ्रेश
षोडशी रहने का बिना एक्सपायरी डेट वाला लाइसेंस धारिणी
डिज़ाईनर चप्पलें पहने आधा दर्जन चपल बालाएं
उम्रें जिनकी रहीं होंगी - कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक वाली

उस पर जलजीरा
उसमें बूंदी
धनिया
और मैं...
अजी थकान गई भाड़ में!

कुल मिला के अच्छा लगा।

कमाल है रास्ते में इतने माल और दुकाने आईं पर कोई भी खाली नहीं थी। मुझे तो एकबारगी ऐसा लगा कि लोग पैनिक में हैं जल्दी जल्दी खरीद लो भईया पता नहीं कल मिले न मिले। पत्नियों के ज़रखरीद गुलाम पति तो बस खरीद करने का ज़रिया यानी द्रव्य उपलब्ध कराने भर को यूजफुल लग रहे थे। बोयफ्रेंड़ो की हालत भी कुछ बेहतर नहीं रही होगी. बेचारे... चलती-फिरती ए टी एम मशीन...बस। मुझे लगा अच्छा हुआ मैं न हुआ, बस हुआ-हुआ करता हुआ करने लगा हूँ ढेंचू-ढेंचू. और अब चर्र-मर्र, जाऊंगा यूं ही मर.

हर रेस्तरां में खाने वाले लोग (हे भगवान मेरी नज़र ने उन्हें भी नहीं बख्शा!!) तो ऐसे लग रहे थे मानो सदियों से भूख से पीड़ित लोगों में ज्यादा खाना तेज़ खाने की रेस लगी हो।

खा खा खा
खामखा खा
खाने के लिए आ 
जा खा कर जा
खोल बैंक में खाता
खुल के खा
खाता जा
आता-जाता खा
बिल चुका
आ कल फिर आ
घर पर कुछ मत बना
कमा
कायम रहने के लिए चूरन खा
पेट खाली करके आ
और फिर खा
जब भी वो मिला
पिला
था खाने पे पड़ा पिला
जो भी मिला
गया खा
खिलखिला
खिला
खा खा खा
खाक में मिलने से पहले खा

रेस्तरां से निकाले गए नाकाम चूहे फ्लाई ओवरों पर चढ़ती-उतरती बस में हिचकोले खाने के कारण अपनी जगह से सरके मेरे आधे ग्लोबल पेट में शेयर बाज़ार में मंदी के कारण किसी मल्टीनेशनल के हाय-दैया करते हुए सी ई ओ की तरह बेचैनी में कुलबुला रहे थे. मैं घर जाकर दाल रोटी (क्या करूं मेरी फेवरेट डिश हई येई) खाने के लिए मरा जा रहा था।

बस जब रिंग रोड से होती हुई धौला कुआँ में दाखिल हुई तो लगा जैसे घर आ गया.  हालाँकि घर वहां से भी 15-20 किलोमीटर दूर होगा पर अब सड़कें और इमारतें जानी-पहचानी लगने लगीं.  यह भी सोचा जो लोग रोजाना अप-डाउन करते हैं वो क्या सोचते होंगे इस बारे में.  और जो लोग दिल्ली के उस हिस्से में रहते हैं वो जब कभी कभी इस तरफ आते होंगे तो कैसा लगता होगा उन्हें. शायद उनका इस तरफ आना ज्यादा होता होगा बनिस्पत दिल्ली के इस तरफ वाले लोगों के वहां जाना.


कमाल है उस तरफ और इस तरफ की दिल्ली का कंट्रास्ट और कैरेक्टर शहर की पूरी आब-ओ-हवा और चाल-ढाल मुझे बिलकुल अलग लगीं. यानि जगहों का रूप-रंग, तेवर और मिज़ाज हर कुछ किलोमीटर के बाद बदल जाता है?

कुल मिलाके अच्छा लगा।

विजय सिंह 

गुरुवार, 6 फ़रवरी 2025

क्या हुए वो दिन

क्या हुए वो दिन

जब तुझे

चैन न था देखे बिन

बस मुझे

लम्हे और पल गिन

होता था इंतज़ार

शाम के आने का

सोचा था एक बार

दुनिया अलग बसाने का

 

जो देखती थी सिर्फ़ मुझे और जो बस मेरे लिये थी वह दुनिया

जिसकी आँखों में मेरा होना लाज़िम-ए-नूर की शर्त थी वह दुनिया और

जिसकी बाहों में ख़ुद को समेटे ख़ुद को महसूस करने हुनर से वाबस्ता होना सीखा था

वो दुनिया

अब कहाँ गई है

मेरे अंधेरेपन की गली

रौशनी में नहा गई है

पर इतने जाहो जलाल में भी

तू आता नज़र नहीं क्यों होते हुए भी

ज़िंदगी भर रहेगा क्या मलाल ये भी 


6 फ़रवरी 2025

शुक्रवार, 17 जनवरी 2025

लड़का

1995 के आसपास लिखी गई पंक्तियाँ

लड़का

भाग रहा है

सड़क पर

नंगे पाँव

पहिया दौडाते हुए

मैं

देख रहा हूँ उसे

पहिया बनते हुए...

 

 

विजय सिंह 

किरण मैम के लिये (उनकी रिटायरमेंट के कुछ दिन बाद लिखी पंक्तियाँ)

 2 मई 2011


किरण मैम के लिये 

(उनकी रिटायरमेंट के कुछ दिन बाद लिखी पंक्तियाँ)


एक न एक दिन तो जाना ही था तुम्हें


तुम

जो अनंतकाल से बाट जोह रही थी कि न आओ

तो आ गया वो दिन कि जब तुम नहीं हो


क्या इसी दिन के लिए ही तो नहीं की थी वापसी मैंने

कि देखने को फिर से खाली नए शीशे से चमचमाता टेबल

कि खाली-खाली-सा मैं और चुप दराजें, और फ़ाईले


क्या फिर उन क्षणों को खींच लाने या उनमें जीने की चाह करूँ

असफल

अंतिम विदा बाक़ी है अभी

जिसे लेने कि तुम्हारी बेचैनी को समझ सकते हुए भी नहीं चाहता मैं समझना


मैं रुक कर तुम्हारी अनुपस्थिति से सिक्त होना चाहता हूँ

भीगता था जो तुम्हारी मौजूदगी में भी...

सोमवार, 23 जनवरी 2023

सांसों की ख़ुश्बू - एक फ्रॉड

जहाँ तक मुझे मालूम है हम सांस लेते हैं तो ऑक्सीजन लेते हैं, और छोड़ते हैं तो कार्बन डाइऑक्साइड। फिर यह 'साँसों की ख़ुश्बू' भला क्या बला है? मुझे लगता है यह कोई फ्रॉड है जो हमारे गीतकारों, रोमांटिक कवियों और गायकों ने हमारे साथ किया है। 

क्या आपकी कार्बन डाइऑक्साइड में ख़ुश्बू है?