मैं जहाँ था वहीं हूँ
बस मेरे पैर तले की
ज़मीन खिसक गई है
तुम्हारी याद का समंदर कभी सूखता नहीं
दिन कट जाता है वजूद की लड़ाई में
संध्या समय जब कटी-फटी लौटती हूँ देहरी के इस पार
अब तक शांत सरोवर सरीखा, मौन, तुम्हारी स्मृति का रत्नाकर
प्रतीक्षारत, सुप्त ज्वालामुखी अचानक से भभक उठता है, जी उठता है,
ठाठें मारने लगता है सागर
जिस की लहरों में डूबती-उतराती भीगती पूरी-की-पूरी नमकीन हो जाती हूँ मैं
तुम्हारी याद का समंदर कभी सूखता नहीं
जी उठते हैं वो मेरे सभी घाव, मन पर पड़ी खरोंचें मुझसे बात करने लगती हैं
पपड़ियों के बीच से ख़ून का रिस-रिसकर बहना मेरे ज़िंदा होने का सबूत बन जाता है
लहरें हैं या वक़्त के नाख़ून हैं
तुम्हारी याद का समंदर कभी सूखता नहीं
नमक से भीगा जल मेरी आँखें अर्पित करती हैं तुम्हें संध्या वंदन में
जान गई हूँ नहीं पहुँचता वह अर्घ्य तुम्हें फिर भी
तुम्हारी याद का समंदर कभी सूखता नहीं
हर रोज़ निकलकर आते हैं मेरे सामने ही दाग़-ए-निहाँ
मुस्कुराती हूँ
पार कर रही होती हूँ सोच के दरिया को
कि मैं नींद में हूँ
तुम्हारी याद का समंदर कभी सूखता नहीं
जब अमावस होती है
घुप्प अंधेरे के आवरण में विलीन हो जाता है मेरा अपना वजूद
मैं हवा-सी हल्की ख़ुद से जुदा
अनिश्चित असहाय
अपने नन्हें से अहम को बचा ले जाना चाहती हुई इस स्वार्थी जगत के सत्तापिपासु गलियारों में जो लोग मुझे कमोडिफाई करके बस एक चीज़ की तरह देखते हैं मेरे आर-पार अमावस की रात उनकी चमकती हुई उनकी खा जाने वाली नज़रों से बच बचाकर लड़खड़ाती कभी सहमकर उनकी ज़द में आ जाती हुई मैं
जान तो गई हूँ तुम अब नहीं हो, दीखते नहीं कहीं मेरे मन की अंतस गहराईयों के स्वामी होने के बावजूद,
मैं ख़ुद को तैयार करने लगती हूँ कि अब जीना तुम्हारे बिना ही होगा मुझे लेकिन
तुम्हारी याद का समंदर कभी सूखता नहीं
लहरें रुकती नहीं
मैं जो तुम्हारी लहरों के सहारे पार उतरने की विवशता को ही तुम्हारा आगोश समझकर इस दुनिया को बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल समझे बैठी थी
अमावस की रात समंदर भी दीखता नहीं
साहिल पर खड़ी मैं तुम्हारी लहरों के शोर से जान जाती हूँ
तुम्हारी याद का समंदर कभी सूखता नहीं
इस तरह फिर-फिर तुम्हारी याद के पारावार में डूबती हूँ शायद जानबूझकर या फिर मेरी ख़ुद पर ही कोई मर्ज़ी चलती नहीं और ज्यों-ज्यों दवा करने का साहस करती रही मर्ज़ बढ़ता गया,
देखती क्या हूँ कि हर पगडंडी तुम तक ही ले जाती है और नई राह पर चलने का दम समेटती हूँ देखती हूँ क्या होता है
तुम्हारी याद का समंदर कभी सूखता नहीं
1 August 2012
क्या हुए वो दिन
जब तुझे
चैन न था देखे बिन
बस मुझे
लम्हे और पल गिन
होता था इंतज़ार
शाम के आने का
सोचा था एक बार
दुनिया अलग बसाने का
जो देखती थी सिर्फ़ मुझे और जो बस मेरे लिये थी वह दुनिया
जिसकी आँखों में मेरा होना लाज़िम-ए-नूर की शर्त थी वह दुनिया और
जिसकी बाहों में ख़ुद को समेटे ख़ुद को महसूस करने हुनर से वाबस्ता होना सीखा था
वो दुनिया
अब कहाँ गई है
मेरे अंधेरेपन की गली
रौशनी में नहा गई है
पर इतने जाहो जलाल में भी
तू आता नज़र नहीं क्यों होते हुए भी
ज़िंदगी भर रहेगा क्या मलाल ये भी
6 फ़रवरी 2025
1995 के आसपास लिखी गई पंक्तियाँ
लड़का
भाग रहा है
सड़क पर
नंगे पाँव
पहिया दौडाते हुए
मैं
देख रहा हूँ उसे
पहिया बनते हुए...
विजय सिंह
2 मई 2011
किरण मैम के लिये
(उनकी रिटायरमेंट के कुछ दिन बाद लिखी पंक्तियाँ)
एक न एक दिन तो जाना ही था तुम्हें
तुम
जो अनंतकाल से बाट जोह रही थी कि न आओ
तो आ गया वो दिन कि जब तुम नहीं हो
क्या इसी दिन के लिए ही तो नहीं की थी वापसी मैंने
कि देखने को फिर से खाली नए शीशे से चमचमाता टेबल
कि खाली-खाली-सा मैं और चुप दराजें, और फ़ाईले
क्या फिर उन क्षणों को खींच लाने या उनमें जीने की चाह करूँ
असफल
अंतिम विदा बाक़ी है अभी
जिसे लेने कि तुम्हारी बेचैनी को समझ सकते हुए भी नहीं चाहता मैं समझना
मैं रुक कर तुम्हारी अनुपस्थिति से सिक्त होना चाहता हूँ
भीगता था जो तुम्हारी मौजूदगी में भी...
जहाँ तक मुझे मालूम है हम सांस लेते हैं तो ऑक्सीजन लेते हैं, और छोड़ते हैं तो कार्बन डाइऑक्साइड। फिर यह 'साँसों की ख़ुश्बू' भला क्या बला है? मुझे लगता है यह कोई फ्रॉड है जो हमारे गीतकारों, रोमांटिक कवियों और गायकों ने हमारे साथ किया है।
क्या आपकी कार्बन डाइऑक्साइड में ख़ुश्बू है?