शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2020

मेरी वैसी ऐसी पोस्ट

 2 अक्तूबर 2019 

मालूम तो है ही आपको के फ़ेसबुक अपनी बात लोगों तक पहुँचाने का अच्छा माध्यम है। इस मंच से दूसरों की बातें सुनी भी जा सकती हैं जैसे इस समय आप सुन रहे हैं।


पोस्ट डलते ही आम हो जाती है इसलिए बहुत सोच-विचार कर पोस्ट डाली जाती है। कभी-कभी तो इसीलिये पोस्ट लिखने में सुबह से शाम हो जाती है या फिर हो जाती है शाम से सुबह। 


यह सब फक़त लाइक्स के लिए बीस-तीस? नहीं जी! यह आपकी ओपन डायरी भी तो हो जाती है!


आपको मालूम है कि अगर मैं अपने बारे में बात कर रहा हूँ तो आप सब को बताने के लिए कर रहा हूँ। या फिर कोई राजनीतिक पोस्ट वग़ैरह अपने आकाओं को ख़ुश करने के लिए डाल रहा हूँ। या किसी एक मुद्दे पर अपना नुक़्ता-ए-नज़र पेश कर रहा हूँ। कई बार जब बात कहने में मुश्किल होती है और किसी और ने कह दी होती है या किसी की पोस्ट आपको अच्छी लग जाती है तो आप उसे शेयर कर डालते हैं। ताकि ज़्यादा-से-ज़्यादा लोगों को पता लगे।


लेकिन पिछले दिनों मैंने देखा कि बाज दफ़े ऐसी पोस्टें भी डाल दी जाती हैं जो किसी एक व्यक्ति को टारगेट करके लिखी जाती हैं। उसका पब्लिक से मतलब नहीं होता फिर भी डाल दी जाती हैं। 


वह व्यक्ति आपकी फ्रेंड लिस्ट में होकर भी आपका फ्रेंड नहीं होता। बट ही इज़ नॉट अ घोषित दुश्मन आल्सो।


तो वह पार्टीकुलर पोस्ट उसी व्यक्ति को व्हाट्सऐप या एसएमएस के माध्यम से क्यों नहीं कही गई? 


चूँकि वह बात नुक़्ताचीनिकल या निंदाने वाली होती है, उस व्यक्ति को सीधे-सीधे नहीं कही जाती। 

याई के मारे फेसबुक पै पोस्ट डारैं। 


मुझे मालूम नहीं अब भी यह ट्रेंड है के नहीं, पहले शहर की दीवारों पर इफ़रात से कुछ वाक्य लिखे मिलते थे जैसे 

रिश्ते-ही-रिश्ते मिल तो लें 28 रैगरपुरा, करोलबाग़ दिल्ली।

खोई हुई जवानी व भरपूर ताक़त दोबारा प्राप्त करें अशोक क्लीनिक, आज़ाद पुर या ख़ानदानी शफ़ाख़ाना, दरियागंज।

इत्यादि।

ऐसे कई वाक्य दूर तक हमारा पीछा करते, और कभी-कभी तो सामने आकर खड़े हो जाते। अगर मैं ट्रेन से कहीं जाता तो देखता रास्ते में ट्रेन की खिड़की से जो भी दीवार दिखाई देती, उस पर उपरोक्त दोनों वाक्य जुगलबंदी कर रहे होते। एक और वाक्य किसी सीमेंट और किसी सरिये के बारे में था। इन वाक्यों से मेरा कोई मतलब न होने पर भी सामने दिखाई दे जाने पर मुझे इन्हें पढ़ना पड़ता और धीरे-धीरे मैं यह समझने लगा कि ख़ानदानी शफ़ाख़ाने का रास्ता 28 रैगरपुरा से होकर गुज़रता है। और उसके बाद ओनिडा टीवी, सीमेंट और सरिये का काम पड़ता है। 


एक शहर को लांघती गाड़ी दूसरे शहर में प्रविष्ट होती लेकिन यह वाक्य गाड़ी के साथ-साथ चलते और गाड़ी की लंबाई से भी लंबे हो जाते। मुझे लगता कि सुदूर दक्षिण और नॉर्थईस्ट में भी कहीं यही कुछ चंद वाक्य लिखे न मिल जाएँ।


कहीं यही वाक्य तो नहीं थे जो पूरे देश को एक सूत्र में बांध रहे थे! 


स्कूल-कालेजों के बाथरूमों, बाहर की दीवारों, गार्डनों के दरख़्तों पर एकाध ऐसा वाक्य लिखा मिलता था जिसे पढ़कर पता चलता था फलाँ लड़का फ़लाँ लड़की से प्यार करता है। या आय लव यू फलाँ लड़की। इन दो-तीन शब्दों के बीच में या इधर-उधर दिल का निशान भी बना होता था, और अधिकतर दिल के बीच में से तीर गुज़रते हुए दिखाया जाता। यह बहुत सफ़ाई से किया गया काम होता कि लगता गोया लिखने वाला प्रेमी नहीं कला-प्रेमी है, या फिर टू-इन-वन है। 


मैं अक्सर सोचता कि फलाँ लड़का फलाँ लड़की के प्रति प्यार के अपने स्वीकार को दीवार पे काय कू लिख रहा है? अबे अगर तुझे प्यार है तो उस लड़की को जाकर बता न! जैसे कुछ लोग दीवार को स्वजलधारा से सिंचित करते हैं तुम कोयले से उसकी सुँदरता बढ़ाना चाहते हो!!!


ख़ैर! 

बैक टू फ़ेसबुक।


अभी मनीष जोशी (हिसार वाले) की एक ऐसी पोस्ट देखी जिसमें उन्होंने एक व्यक्ति जिसे वो बड़ा ड्रेक्ट्र समझ रहे थे, वह चोर निकला का उलाहना अपनी पोस्ट के माध्यम से दिया है। लेकिन उन उलाहना रिसीवर का नाम अपनी पोस्ट में नहीं लिखा। मैं दुआ करता हूँ, उन उलाहना रिसीवर जी ने उस पोस्ट को पढ़ लिया होगा और विदाउट ऐनी ऐम्बिगिटी उसे स्वीकार या अस्वीकार चुपके से कर दिया होगा। वैसे भी, व्यक्ति को अपनी सफलता को ऐग्रीगेट करना चाहिए न कि चोरी जैसी छोटी-मोटी बातों पर रिग्रेट करना चाहिए।  


इस पोस्ट और ऐसी कई अन्य मितरों की आइडेंटिकल पोस्टें पढ़कर कुछ-कुछ मायने समझ में आते हैं जिनका मनीष जोशी हिसार वाले से कोई स्ट्रेट ताअल्लुक़ न माना जाए। 


जनरली इसके दो (या शायद तीन-चार) फ़ायदे होते हैं। 


एक तो यह कि अमुक को अपनी बात कहकर देल्ल (दिल) नूं ठंड पै गी, और कौनो नुकसनवा भी नहीं हुआ। 


और यह भी कि 'मइ किस्सी से डरता नक्को साफ़-साफ़ कैने वाला आदमी ऊँ' का भाव भी बना रहता है। साथ ही बंदे तक बात भी पहुँच जाती है और उससे (रि)लेशनशिप भी क़ायम रहती है। कल को आप आसानी से कह सकते हैं - मैंने आपके लिए थोड़े ही कहा था जी!! 


या हो सकता है ऊपर जो बातें मैंने कही, वैसा न होता हो बल्कि कुछ और ही होता हो। 


इस पोस्ट, और दीगर पोस्टों को पढ़कर कछु और मायने बी सम्ज आ रे ऐं पै दिल कै रा ऐ 

ओ छड्ड वी यार हुण!!


और जब अनेक मिट्रों की ऐसी पोस्टें देखीं तो मैंने सोचा क्यों न मैं भी ट्रेंडी बन फेसबुक में विचरण करूँ और ऐसी पोस्ट डालूँ!! निंदा वाली नहीं तो न सही, कुछ और सही। 


तो दोस्तो

मेरी वैसी ऐसी पोस्ट यह रही - 


आज शाम साढ़े छह बजे रिवोली सिनेमा पर मिल जाना।

बुधवार, 30 सितंबर 2020

 

राम मंदिर बनवाना उनके निकट पवित्र कार्य था।

मंदिर बनवाना एक पवित्र कार्य था/है भी।

 

लेकिन यदि मंदिर ‘वहीं’ बनना था तो बस एक ही अड़चन थी। यह स्पष्ट ही था कि यदि मंदिर ‘वहीं’ बनाएँगे तो ‘वहीं’ जो ढाँचा, या स्पष्टतः मस्जिद मौजूद थी, उसको गिराना पड़ता।

 

यह क़ानूनन ग़लत होता। और यही हुआ भी। यह क़ानूनन ग़लत रहा आया।

 

क़ानूनन ग़लत होना कोई बड़ी बात नहीं होती अगर आपकी मंशा सही हो।

 

मान लीजिए आपको किसी बीमार या दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति को अनिवार्यतः तुरंत अपने दुपहिया वाहन पर अस्पताल लेकर जाना पड़े और आपके पास ट्रैफिक नियम के तहत हेलमेट ना हो तो आप थोड़े ही क़ानूनन सही होने के चक्कर में किसी की जान जाने देंगे।

बिना हेलमेट ही निकल पड़ेंगे और जुर्माना भरना पड़ जाए तो अफ़सोस न होगा।

आप तसल्ली कर सकते हैं कि नियम आपने तोड़ा, लेकिन किसी के भले के लिये तोड़ा।  

 

तो मस्जिद तोड़ना ज़रूरी था। और अनिवार्यतः तुरंत ज़रूरी था।

हिंदुओं के भले के लिये यह ज़रूरी था।

आख़िर हिंदू कब तक सोया रहता।

 

कुछ क़ानून के अंधेपन की आड़ भी उपलब्ध हो गई थी।

एक महान (अ)टल नेता ने कह दिया था कि ज़मीन समतल करने की इजाज़त मिल गई है।

 

मगर क़ानून तो क़ानून है।

ज़ाहिर है यह ढाँचा गिराना अंततः ग़लत था ही।

और इस ग़लती के लिए, देश में ज़हरीला माहौल पैदा करने के लिए सज़ा भी मुक़र्रर की गई है।

 

पर हिंदू धर्म के भले के लिये यदि एकाध क़ानून तोड़ना भी पड़ जाए और उसके लिये सूली पर भी चढ़ना पड़ जाए तो सौदा बुरा नहीं था।

 

हिंदू हृदय सम्राट के रूप में इस देश की सांप्रदायिक जनता के हृदय में सदा के लिये भी प्रतिष्ठित ही नहीं हो जाते, दूसरे भी तारीफ़ करते कि बंदे में था दम

जो कहा सो किया और कहा भी कि हाँ मैंने किया।

 

अब गांधी को ही देख लीजिए।

नमक क़ानून तोड़ा बंदे ने और डंके की चोट पर तोड़ा।

उस एक धोती पहनने वाले, अधनंगे फ़कीर ने क़ानून तोड़ने के लिये डांडी यात्रा भी की और हजारों-हजार लोगों के साथ की।

अधनंगे गांधी ने स्वीकार किया कि

हाँ बे अंग्रेज़ों मैंने नमक क़ानून तोड़ा।

और उनके साथ आए हजारो-हजार लोगों ने भी कहा कि

हाँ बे अंग्रेज़ो, बापू ने नमक क़ानून तोड़ा।

उखाड़ लो क्या उखाड़ लोगे।

 

क्योंकि गांधी बेशक़ क़ानूनन ग़लत थे, पर नैतिक तौर पर सही थे।

उसके एवज में जेल जाना भी उन्हें मंज़ूर था।

 

लेकिन

यह लीदरान हैं कि

इन्होंने हल्ला-शेरी दी

एक धक्का और दो बाबरी मस्जिद तोड़ दो

देश की जनता का ध्रुवीकरण किया

हजारों-हजार लोग इनके साथ थे और उस घटना के बाद

यह नेता लोग और इनकी साम्प्रदायिक जनता ख़ुशियाँ मना रही थी, इसके बावजूद

इन्होंने कहा - हमने तो यह किया ही नहीं

हजारों हजार जनता में से भी कोई नहीं बोला।

 

जो इनके नज़दीक पवित्र कार्य था उसकी ज़िम्मेदारी भीड़ पर डाल दी और लो

यह अँग्रेज़ों के परम् पिछलग्गू

बच गए।

 

ऐसे झूठ की नींव पर अपने धर्मस्थान बनाओगे बे?

 

फिर यह कथित कॉज़ के लिये लड़ने वाले टुल्लमटुल्लू नेता

गांधी का चरित्र हरण करते हैं और ख़ुद के लिये वैलिडिटी चाहते हैं।

 

ज़ाहिर हैं इन लीदरान की जैसी भी नैतिकता थी और उनके शरीर में यह नैतिकता

जहाँ कहीं भी वास करती थी (क्या पता मन में करती ही हो)

उसके अनुसार अपने कृत्यों का उन्हें पता था कि

यह उन्होंने ठीक नहीं किया।

 

तथाकथित हिंदू नेताओं के लिये ढाँचा गिराया जाना नैतिक तौर पर ग़लत रहा होगा तभी तो

आज तक वे उसकी ज़िम्मेदारी नहीं ले पाए और

जिस पवित्र कार्य के लिये हँसते-हँसते उन्हें सूली पर चढ़ जाने के लिये तैयार रहना चाहिए था

उसे कर जाने को कभी स्वीकार नहीं कर पाए।  

 

इनसे अच्छे तो वे आतंकवादी संगठन होते हैं जो कोई घिनौनी वारदात को अंजाम देते हैं और फिर प्रेस रिलीज़ में इसकी ज़िम्मेदारी लेते हैं।

 

ढांचा गिराना अगर सही था तो ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए न!

ज़ाहिर है ढांचा गिराना सही नहीं था।

 

यदि कोई अवैध निर्माण होता है तो दिहाड़ी कर रहे मज़दूरों को पुलिस पकड़ती है या उस ठेकेदार को और फाइनेंसर को जो वह निर्माण करवा रहे होते हैं!

 

तो ऐ मेरे दोस्तो

सांप्रदायिक हिंदुओं

धरम के तथाकथित पहरेदारों

 

आप यदि उन लीदरों के कहने पर माथे पर तिलक लगाए, भगवा कफन बाँधे अगर निकल पड़े थे जयश्रीराम की हुंकार भरते हुए

तो आज जान लो

 

आप उस धर्मांध व्यवस्था के अवैध निर्माण में केवल दिहाड़ी मज़दूर थे/हो और

इल्ज़ाम आप ही के सर है

क्योंकि जिनके कहने पर आप चल पड़े थे,

प्रतिहिंसा की आग में जल पड़े थे,

वे अपने कहने से ही मुकर गए।

वह आपकी हुंकार नहीं, हुँआ-हुँआ साबित हुई।

 

आपकी दिहाड़ी के रूप में आपको क्या मिला?

स्वाभिमान? सुरक्षित भविष्य? आत्मिक और दैवीय मोक्ष?

 

सोच कर देखो बे तुम्हें क्या मिला।

ऐसा क्या मिला जो मस्जिद न तोड़ते तो तुम्हें नहीं मिलता और अब मिल गया।

 

ऐसा ही ‘पवित्र कार्य’ इन्होंने गांधी को मारने का किया था।

लेकिन आज तक उसी गोडसे को अपना आधिकारिक आइकॉन नहीं बना पाए हैं हिंदू पाकिस्तान का सपना संजोने वाले यह भाषणवीर।

 

कुछ उन्मादी छुटभैये नेता ऐसा करते भी हैं तो मुख्य हिंदू पहरेदार कह देते हैं कि हम इन्हें ‘मन से माफ़ नहीं कर पाएँगे’।

 

अरे अगर उद्देश्य पवित्र है तो स्वीकार करो ना।


https://www.bbc.com/hindi/india-54357292

बुधवार, 23 सितंबर 2020

बावजूद भी!!!

 

23 September 2019


कल मम्मी-डैडी नहीं थे घर पर तो....


तो कल मैंने बहुत दिनों बाद टीवी देखा। 


अपने माँ-बाप से डर उतनी वजह नहीं है टीवी न देखने की। 


असल वजह यह है कि टीवी मम्मी-डैडी के कमरे में है जो ग्राउंड फ्लोर पर है। और मैं सेकंड फ्लोर पर रहता हूँ।


मैं रात दस बजे के बाद ही घर दाखिल होता हूँ तब तक मम्मी-डैडी सो चुके होते हैं और मुझे भी अपने कमरे में लेट कर लैपटॉप देखना होता है। 


मेरे बच्चे और प्रोमिला भी - जो तब तक सोये नहीं होते, मेरे आने का इंतज़ार करते हैं क्योंकि मेरे फोन का वायफाय लैपटॉप से जोड़कर कोई फ़िल्म-शिल्म देखी जाती है। 


मेरे फोन में अच्छा ख़ासा इंटरनेट डाटा है और स्पीड भी उसकी ठीक-ठाक है। प्रोमिला और बच्चे अपना डाटा ख़त्म करके मेरी उडीक (इंतज़ार) में बैठे रहते हैं। 


सुबह कुछ समय के लिए मम्मी-डैडी के पास बैठता हूँ तो घर-परिवार की बातें होती हैं, इत्यादि। तो टीवी उस समय चलाने का सवाल ही पैदा नहीं होता। 


मेरे कमरे में टीवी नहीं है। 

कारण यू अँडरस्टैंड वेरी वैल। 


दिन में या अर्ली ईवनिंग जब ये सब लोग घर में ग्राउंड फ्लोर पर होते हैं तो भी टीवी केवल कुछ ही देर के लिए देखते हैं। 

मम्मी-डैडी से डर केवल मुझे ही नहीं लगता।


वैसे टीवी लगभग सारा दिन चलता है। मेरे बापू को टीवी न्यूज़ देखनी होती है और वो एनडीटीवी को छोड़कर बाक़ी सभी न्यूज़ चैनलों की न्यूज़ें देखते हैं।

कारण यू अँडरस्टैंड वेरी वैल। 


उन चैनलों में जो थोबड़े बार-बार दिखाये जाते हैं उन्हें हमारे घर में और कोई देखना नहीं चाहता। ख़ैर..।


मम्मी-डैडी पंजाब से रात की ट्रेन से लौट रहे थे। वे केवल दो रातों के लिए घर से बाहर थे। तो दोनों रात हमें उनके कमरे में सोना था। कारण यू अँडरस्टैंड वेरी वेल। 


देश सुरक्षित हाथों में हैं बोलने वालों को सपोर्ट करते मेरे बाप को न जाने क्या हो जाता है जब रात नौ बजे के बाद वो मुझे बार-बार फोन करके मेरी लोकेशन जानना चाहते हैं और कहते हैं अज्जकल टैम बड़ा ख़राब ऐ छेती (जल्दी) घर आ जाया कर। ख़ैर...।


तो एक रात पंजाब में, और दूसरी रात वापसी के सफ़र में, मम्मी-डैडी घर से बाहर थे।


उनके पंजाब जाने का सफ़र दिन में ही पूरा हो गया था। सुबह पौने सात बजे की गाड़ी पकड़ वे दोपहर बाद तक गंतव्य स्टेशन उतर गए थे। 


मैंने अपने मोबाइल ऐप से दोनों की टिकट बुकिंग सीनियर सिटीजन कन्सेशन के साथ की थी और सीट प्रेफ्रेंस में विंडो लिखा था। मुए रेलवे ऐप को न जाने क्या हुआ एक को सीट नंबर 8 दिया और दूसरे को 18, यानी दूर-दूर। 


आप कह सकते हैं कि जो सीट अवेलेबल होगी वही मिलेगी। पर जनाब! जब मैं बुकिंग कर रहा था तो 452 सीटें अवेलेबल थीं जी। इन अच्छे दिनों में दो बुज़ुर्गों को आमने-सामने सीट भी न दे सकी रेलवे!! 

ख़ैर...।


मम्मी-डैडी दो रातों के लिए घर से बाहर थे और मुझे, प्रोमिला और हमारे एक बच्चे को नीचे, यानी ग्राउंड फ्लोर वाले कमरे में सोना था। 


पहली रात मैं घर जाते ही सो गया क्योंकि बहुत थका हुआ था। दूसरी रात थोड़ा-सा टीवी देख के सोया क्योंकि घर में जब घुसा तो बच्चे टेलीविजन लगाकर बैठे थे और केबीसी आ रहा था। 


मुझे जैसे यह मालूम नहीं है कि साउथ अफ्रीका की क्रिकेट टीम इंडिया आई हुई है, उसी तरह मुझे यह भी पता न था कि केबीसी अब भी आता है। 


तो उस समय केबीसी आ रहा था। 

शो के एंकर जिन्हें इस सदी का महानायक कहा जाता है, के सम्मुख एक ज़ोरदार अभिनेता की हट्टी-कट्टी बेटी - एक हीरोइन बैठी थी। वह सदी के महानायक के सम्मुख हॉट सीट पर एक उद्यमशील महिला के साथ बैठी थी। 


रानी पद्मावती की (कुछ लोगों के अनुसार) काल्पनिक या अवांतर-वास्तविक कथा पर आई फिल्म का पुरज़ोर विरोध करने वालों के आन-बान जैसा ही गाँव रहा होगा जहाँ यह उद्यमशील महिला पैदा हुई और पली-बढ़ी थी। जैसा कि शो से पता चल रहा था, उस घोर चाउवनिस्टिक समाज में रहकर भी ख़ुद को और साथी महिलाओं को आगे बढ़ाने, उनकी आर्थिक स्थिति सुधरवाने में उस उद्यमशील महिला ने उल्लेखनीय काम किया था।


जिस प्रकार के उसके कामों और सब महिलाओं के साथ से सबके वाकई और किसी नारेबाज़ी से दूर सच्चे विकास का काम वह करती आ रही थी, मुझे वह वामा वामपंथी प्रतीत हुई। 


उसने मार्क्स और समाजवाद भले न पढ़ा हो, मगर पद्मावती सरीखी-सुंदर, महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता की पक्षधर वह महिला समाजवाद और कम्यूनिज़्म के दर्शन को जी रही थी (बोले तो, आय फेल्ट लाइक दैट)। 


केबीसी में पूछे गए एक रामायण आधारित प्रश्न का सीधा-सादा उत्तर दमदार अभिनेता की वह हट्टी-कट्टी हीरोइन न दे सकी, न ही दे सकी उस प्रश्न का उत्तर वह उद्यमशील महिला ही, जिसके साथ थी बैठी वह हीरोइन। उस प्रश्न का उत्तर देने के लिए उन दोनों महिलाओं को लाइफलाइन रूपी एक एक्सपर्ट का सहारा लेना पड़ा जो कि येट अगेन एक महिला थी। उस एक्सपर्ट ने बचपन या कैशोर्यावस्था में देखे एक टेलीविजन सीरीयल का वास्ता या हवाला देकर बताया था कि हनुमान संजीवनी बूटी लक्ष्मण के लिए लाए थे। और जैसे लक्ष्मण की बची थी, इस लाइफलाइन से उन दोनों महिलाओं की जान बची थी। गोया वह महिला गंधमादन पर्वत से ही अवतरित हुई हो। 


हट्टी-कट्टी हीरोइन के इस आसान-सा जवाब दे पाने में अक्षम रहने को लोगों या ट्रोलों, जो भी आप कहें, ने हाथों-हाथ लिया और सोशल मीडिया पे दे पोस्ट-पे-पोस्ट पेलकर हट्टी-कट्टी हीरोइन को निंदाने लगे (इस सेन्टेंस को आप लास्ट वाले 'दे' के बिना भी पढ़ सकते हैं अगर चाहें)।


सोशल मीडिया पर उस उद्यमशील वामा की उद्योगिता की प्रशंसा में लेकिन एक भी पोस्ट न थी।


हैरानी इस बात पर भी थी कि उस मोस्ट ईज़ी क्वेश्चन का सिंपलेस्ट आन्सर वह उद्यमशील महिला भी न दे पाई थी किन्तु उसकी इस अज्ञानता को आराम से इग्नोर दिया गया। सबको शिक़ायत थी तो केवल हट्टी-कट्टी हीरोइन से जिसके पापा का नाम रामायण के चरित्रों में से एक पर था और चचा-ताऊ के नाम भी जस्ट लाइक दैट थे। और तो और, दमदार अभिनेता की बेटी हट्टी-कट्टी हीरोइन के घर का नाम भी रामायण था।  तो जनाब ट्रोलों ने तो ट्रोलना था और वे जी भर के ट्रोले भी।


ओह हो!! मेरी यह पोस्ट सुरसा के मुख की तरह बढ़ती जा रही है, या हनुमान की पूँछ की तरह लंबी होती जा रही है। 


अब तक वह बात नहीं आई जिसे लिखने के लिए यह पोस्ट शुरू की थी।


तो मैंने जब कई दिनों बाद टीवी देखा, और टीवी में उस समय आ रहा केबीसी देखा तो मैं क्या देखता हूँ कि अमिताभ बच्चन किसी बात को कहते हुए 'बावजूद भी' बोल रहे हैं। यानी शब्द 'बावजूद' के साथ शब्द 'भी' का भी इस्तेमाल कर रहे हैं।


मैंने सुना है कि 'बावजूद' के साथ 'भी' का प्रयोग नहीं होता क्योंकि 'भी' बावजूद में अंतर्निहित है।


एक समय टीवी पर सत्यमेव जयते नामक कार्यक्रम में मैंने अभिनय की खान आमिर ख़ान को भी 'बावजूद' के बाद 'भी' का प्रयोग करते देखा था। 


मुझे उस दिन कोफ़्त हुई थी। पर कोफ़्ते जो उस दिन घर में बने थे टेस्टी बने होने के कारण मेरी खीझ की एनर्जी  डाइवर्ट होकर खाने की तारीफ़ में कन्वर्ट हो गई थी।  


आमिर ख़ान से तो जो शिक़ायत थी, सो थी, पर अब अमिताभ बच्चन ने भी 'बावजूद' के बाद 'भी' बोल डाला। इस बात से मेरा कान्फिडेंस थोड़ा हिल गया, कि यार कहीं मैं ई तो गल्त नईऊँ? 


तो आज की रात, जब मैं यह पोस्ट लिखते हुए आधी रात के इस पार आ गया हूँ, मैं, प्रोमिला, हमारे ज्वाइंट फैमिली के बच्चे-कच्चे हमारे ऊपर वाले अपने कमरे में सो रहे हैं। और आज (यानी टेक्निकली कल) हमने लैपटॉप पर एक नहीं, पूरी दो-दो फ़िल्में देखीं। एक तो थी राजेश खन्ना और नंदा अभिनीत सस्पेंस फिल्म इत्तेफाक। और दूसरी में भी नंदा थी। दूसरी फ़िल्म का नाम था गुमनाम। 


फ़िल्म इत्तेफाक के एक सीन में जब मैंने इफ़्तेख़ार जैसे मँझे हुए अनुभवी अभिनेता को एक संवाद में 'बावजूद भी' बोलते देखा तो क़सम से मुझपे क्या गुज़री होगी अल्ला ही जानता है। 


तो अब आप ही बताइए भाईसाहब 

क्या 'बावजूद' के बाद 'भी' लगाना करेक्ट है?

मंगलवार, 25 अगस्त 2020

अच्छा हुआ

जो तुमने मुझे छोड़ दिया

ख़रीदनी तो न पड़ेंगी दो प्लेट चाट पकौड़ी की



गुरुवार, 25 जून 2020

बस स्टॉप पर खड़ा था ।
बस के इंतज़ार में।
बहुत देर से आई नहीं थी।

निराश और नाउम्मीद हो चुका था।
तभी भगवान ने मेरी बिना बोले ही सुन ली।
लो!
एक साथ दो बसें आ गईं।

एक साथ इतनी मेहरबानी बर्दाश्त न कर पाया।

समझ न पाया किसमें चढ़ूँ।
अनिर्णय से ठस्स खड़ा रह गया।
फिर जैसे अचानक होश आया।

पैर पहली बस की ओर भागे।
मन दूसरी बस की ओर भागा।

आख़िर पैरों को मन की माननी पड़ी।
पहली छोड़ दूसरी की ओर।
भागा।

लेकिन।
मेरे मन कछु और था वा ड्राइवर के मन कछु और।
रोकते-रोकते बस उसने आगे बढ़ा ली।

अब क्या होगा!!!
मेरे पैरों ने मेरे मन को माँभैन की गाली निकाली।
और पहली वाली की ओर भागे।
इस बार मन ने पैरों का साथ दिया।

लेकिन यह साथ कुछ काम न आया।
पहली वाली भी चल पड़ी।
निकल गई।
मैं खड़ा देखता रह गया।
छूट गई।

अगली वाली जब तक आए।
तब तक।
सोचा।
सस्पेंस और थ्रिल से भरपूर।
यह पोस्ट ही लिख लूँ।
-

बुधवार, 24 अप्रैल 2019

कॉमन और वैल्थ का फासला मिट जाए इसी विल के साथ इति 19वाँ अध्याय

नाउ डोंट हारास्स अस ओ माईटी
गो ग्लासगो
लेट अस अवर डर्टी लिनेन धो

भैया कलमाडी ...
भैया....
ओ भैया...
(किसी स्टेडियम की फाल्स सीलिंग के नीचे बैठे रो रहें हैं चुपचाप, जो अब गिरने का नाम नहीं ले रही और कोई खबर भी नहीं बन रही)

और दीदी दीक्षित
दीदी...
दीदी प्लीज़
नहीं दीदी ऐसा नहीं करते
उदास मत हो

अगली बार भी तुम्हें ही वोट मिलेंगे
वोटर सारे डिसलेक्सिया से पीड़ित हैं
अभी तो चकाचौंध से चित्त हैं

अरे कोई खिलाड़ियों की तो बात ही नहीं कर रहा

अजी छोड़िए साहब खिलाड़ियों को कौन पूछता है
आजकल तो स्पोर्ट्स मैनेजमेंट का ज़माना है
बेटे को इसी में डिप्लोमा कराना है
और खेलगांव में बस जाना है

जाओ खिलाड़ियों डोंट वेस्ट टाईम
एशियाड की तैयारी करो
प्रेस - व्रेस में कोई बयान मत दो

गो

विजय सिंह
वर्ष 2010 में दिल्ली में हुए 19वें कॉमनवैल्थ गेम्स ख़त्म होने पर।  

15 अक्तूबर 2010

शनिवार, 29 दिसंबर 2018

एक्सीडेंटल था
उस पर किसी और का कंटरोल था
जे बातें ऐसे बता रए जैसे
आम लोगन कू पैले से पतो ई न था।
एक्सीडेंटल न होकर सुनियोजित होता तो उस पर किसी और का कंट्रोल
नहीं होता क्या?
जे वाला बेलगाम हैगा क्या?
बेलगाम कोई न होत्ता,
बस यू देखना पड़े के यो लगाम ससुरी है किसके हाथ मै।
आम जन के हाथ में लगाम न होती कभी। उनके हाथ में तो केवल लगान होता है
ये बात आम जन और मैंगो पीपुल सब कू मालूम है
कोई सिकायत भी न करता इस बात की ।
इसी को शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व कहवें (जादा एक्सप्लेन 'उखाड़ लेंगे' वाली पंक्ति के बाद किया गया हैगा)।
तो, जे जो नियोजित किया गया है न,
जे जो एक्सीडेंटल नाय हैगो,
इसके बी सब सीक्रेट सब कू मालूम ऐ।
इसके भक्तों को बी मालूम हैंगे (जैसे उसके भक्तों को मालूम थे)।
कई तो इसके भक्त हैं ही इसीलिए के उन्हें वो सब मालूम है।
उन भक्तों को चईए ई ऊ।
विकास लेके ऊ के करेंगे?
स्वच्छता अभियान के उनके अपने मतलब हैंगे।
सब कौ पतौ जे नियोजित है और आन वारा बी नियोजित ई होएगो।
एक्सीडेंटल बी होयगो तौ हम्म के उखाड़ लेंगे।
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शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का अर्थ है आप इन्सेक्योर रहें और वो सेक्योर।
आप सिर्फ इसी बात से सुरक्षित महसूस करें के उसकी निगाह आप पर न पड़ी।
वरना वो जब चाहे आपको मार दें और आप चूँ न करें और कातिलों को थैंक यू कहें कि वो और बुरी तरह से आपको मार सकते थे लेकिन उन्होंने बख्श दिया।
आपमें ऐसी दिव्य भावना की मौजूदगी को वो समय-समय पर दंगों, इंकुइरी (inquiry) इत्यादि से टेस्ट करता रहता है और शासित होने का शार्ट टर्म कोर्स आपको करवाता रहता है।
आप डर-कर-मर-कर टाइम पास करते हैं। सामने से आता कोई आपका कुशल मंगल पूछता है तो आप कह देते हो - ठीक ही चल रहा है सब।